काठमांडू , मई 03 -- विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जहां दुनिया भर में स्वतंत्र पत्रकारिता, संस्थागत स्वायत्तता और लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति की रक्षा की बात हो रही है, वहीं नेपाल में नयी सरकार ने राष्ट्रीय समाचार समिति सहित विभिन्न सरकारी संस्थानों से 1,200 से अधिक अधिकारियों की एक झटके में बर्खास्त करके प्रेस स्वतंत्रता और संस्थागत निरंतरता पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल द्वारा जारी अध्यादेश "सार्वजनिक पदाधिकारियों को पद से हटाने संबंधी विशेष प्रावधान अध्यादेश, 2026" के तहत 26 मार्च से पहले नियुक्त सभी सार्वजनिक पदाधिकारियों को स्वतः पदमुक्त कर दिया गया। इस कदम के दायरे में प्रशासनिक, शैक्षणिक, स्वास्थ्य, नियामक और मीडिया संस्थान आदि आते हैं।
इसे हाल के वर्षों में किए गए सबसे व्यापक प्रशासनिक सुधारों में से एक बताया जा रहा है। इस प्रावधान के तहत यह अनिवार्य है कि 26 मार्च से पहले की गयी सभी नियुक्तियां स्वतः ही समाप्त मानी जायेंगी, चाहे उनका कार्यकाल, लाभ या नियुक्ति की शर्तें कुछ भी हों।
"प्रचलित कानूनों में कहीं और कही गई किसी भी बात के बावजूद, 26 मार्च से पहले की समय-सारिणी के अनुसार सार्वजनिक संस्थाओं में नियुक्त और वर्तमान में पद पर आसीन सार्वजनिक अधिकारियों को, इस अध्यादेश के लागू होते ही, उनके संबंधित पदों से स्वतः हटा दिया जाएगा," दस्तावेज़ में यह कहा गया है।
नेपाल विद्युत प्राधिकरण में, प्रबंध निदेशक हितेंद्र देव शाक्य और बोर्ड के सभी सदस्यों को हटा दिया गया है। प्रभावित होने वाले अन्य प्रमुख संस्थानों में नेपाल दूरसंचार प्राधिकरण, नेपाल नागरिक उड्डयन प्राधिकरण, नेपाल पर्यटन बोर्ड, नगर विकास कोष और औद्योगिक उद्यम विकास संस्थान शामिल हैं।
इस अध्यादेश के कारण नेपाल प्रशासनिक कर्मचारी महाविद्यालय, लुम्बिनी विकास न्यास, पशुपति क्षेत्र विकास न्यास, तकनीकी शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण परिषद, काठमांडू घाटी विकास प्राधिकरण, नेपाल जल आपूर्ति निगम, नागरिक निवेश न्यास, प्रेस परिषद नेपाल, नेपाल कृषि अनुसंधान परिषद, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड और राष्ट्रीय चाय एवं कॉफी विकास बोर्ड में भी नियुक्तियां रद्द की गयी हैं।
इसके अलावा, सामाजिक कल्याण परिषद, नेपाल स्काउट्स, न्यूनतम वेतन निर्धारण समिति, जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद, स्वदेशी राष्ट्रीयताओं के विकास के लिए राष्ट्रीय फाउंडेशन, सड़क बोर्ड नेपाल, नेपाल प्रतिभूति बोर्ड, सार्वजनिक खरीद समीक्षा समिति, विदेश रोजगार बोर्ड, नेपाल अकादमी, विद्युत नियामक आयोग, बीमा प्राधिकरण और सुरक्षा मुद्रण, आदि संस्थानों में भी और नियुक्तियां रद्द की गई हैं।
सबसे अधिक चिंता राष्ट्रीय समाचार समिति (आरएसएस) जैसे राज्य के प्रमुख समाचार संस्थान को लेकर जताई जा रही है, जहां शीर्ष पदाधिकारियों की बर्खास्तगी ऐसे दिन हुई है जब वैश्विक स्तर पर मीडिया की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक सूचना व्यवस्था के महत्व को रेखांकित किया जा रहा है।
नेपाल में राष्ट्रीय समाचार समिति सरकारी सूचना प्रवाह, सार्वजनिक संवाद और राष्ट्रीय समाचार वितरण का केंद्रीय संस्थान है। राष्ट्रीय समाचार समिति सहित प्रेस काउंसिल नेपाल, फिल्म डेवलपमेंट बोर्ड और अन्य सार्वजनिक संचार निकायों में नेतृत्व हटाए जाने से यह आशंका बढ़ी है कि नई नियुक्तियां राजनीतिक निष्ठा के आधार पर की जा सकती हैं।
सरकार का तर्क है कि यह कदम व्यापक प्रशासनिक सुधार और पुराने राजनीतिक प्रभावों को समाप्त करने के लिए उठाया गया है।
बड़े पैमाने पर की गई इन बर्खास्तगियों ने शासन, निरंतरता और सेवा वितरण को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। निर्णय लेने वाली संस्थाओं के निष्क्रिय हो जाने से, विशेषज्ञ नियमित प्रशासन और नीति कार्यान्वयन में देरी की चेतावनी दे रहे हैं।
काठमांडू पोस्ट की एक रिपोर्ट में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष भीम प्रसाद सुबेदी के हवाले से कहा गया कि यदि यह कदम सुधार की भावना से प्रेरित है तो इसे सकारात्मक रूप से देखा जा सकता है, लेकिन इसके साथ आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों के प्रति भी सतर्क रहना चाहिए।
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