, Sept. 17 -- नयी दिल्ली, 17 सितंबर। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में गुरुवार को नवशोध केंद्रो का उद्घाटन, साधु समागम, ग्रंथ लोकार्पण एवं सम्मान समारोह आयोजित किया गया। समारोह में पांच ग्रंथों का लोकार्पण किया गया। इनमें आचार्य मध्वाचार्य से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रंथ 'श्री माध्वभाष्य' का हिन्दी अनुवाद भी शामिल रहा। इसमें संस्कृत, शास्त्र और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण-संवर्धन के साथ गुणवत्तापूर्ण शोध को व्यापक स्तर पर प्रोत्साहित करने पर विशेष जोर दिया गया।

इस अवसर पर कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि किसी भी महत्वपूर्ण ग्रंथ के लेखन एवं अध्ययन से पूर्व उसके विषय, संदर्भ और परंपरा को गहराई से समझना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि परमपूज्य श्री विश्वप्रसन्नतीर्थ स्वामी के करकमलों से 'श्री माध्वभाष्य' के हिन्दी अनुवाद का लोकार्पण होना विश्वविद्यालय के लिए गौरव का विषय है।

इस अवसर पर का भी लोकार्पण किया गया। इसके माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित संस्कृत, पाली एवं प्राकृत भाषाओं में उपलब्ध पांडुलिपियों के कैटलॉग और शोध-सामग्री को एक मंच पर उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया है। इससे शोधार्थियों एवं अध्येताओं को विभिन्न संस्थानों में उपलब्ध पांडुलिपि-संपदा से संबंधित जानकारी प्राप्त करने में सुविधा होगी। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के सहयोग से विद्यार्थियों के लिए तैयार 'सरल मानक संस्कृत' आधारित क्रीड़ा पुस्तक का भी विमोचन किया गया।

समारोह का विशेष आकर्षण पेजावर अधोक्षज मठ के पीठाधीश्वर परमपूज्य श्री विश्वप्रसन्नतीर्थ स्वामी का अभिनंदन रहा। विश्वविद्यालय की ओर से उनका पारंपरिक रूप से स्वागत एवं सम्मान किया गया तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें 'सनातनधर्मप्रवर्तनाचार्य' की उपाधि से सम्मानित किया गया।

स्वामी महाराज ने अपने आशीर्वचन में संस्कृत, शास्त्र और सनातन ज्ञान परंपरा के संरक्षण तथा उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के प्रयासों को और सशक्त बनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

मुख्य अतिथि प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत एवं शास्त्रीय अध्ययन की समृद्ध विरासत का उल्लेख करते हुए वर्तमान समय में शोध की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त किए।

समारोह में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के नवस्थापित शोध केंद्रों का उद्घाटन भी किया गया। शोध एवं विकास प्रकोष्ठ के निदेशक प्रो. गणेश टी. पण्डित ने नवशोध केंद्रों का परिचय देते हुए कहा कि इनके माध्यम से विश्वविद्यालय की शोध गतिविधियों का विस्तार करने के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विविध विषयों में अध्ययन, अनुसंधान, प्रकाशन एवं अन्य अकादमिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि इसके अंतर्गत मुम्बा देवी आदर्श स्नातकोत्तर शोध संस्थान, मुंबई; भारतीय ज्ञान परंपरा प्रभाग, डेक्कन कॉलेज परिसर, पुणे; संस्कृत अकादमी, हैदराबाद तथा हरियाणा संस्कृत विद्यापीठ, बघोला सहित नए शोध केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के शोधार्थियों एवं विद्वानों को शोध के अधिक अवसर उपलब्ध हो सकेंगे।

वक्ताओं ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का संरक्षण और संवर्धन करने के साथ आधुनिक संदर्भों में उसका वैज्ञानिक, तुलनात्मक एवं अकादमिक अध्ययन भी आवश्यक है। संस्कृत, शास्त्र, पाली, प्राकृत तथा भारतीय ज्ञान-विज्ञान के विविध आयामों पर मौलिक एवं गुणवत्तापूर्ण शोध को बढ़ावा देने और शोधार्थियों को व्यापक अकादमिक विमर्श से जोड़ने पर विशेष बल दिया गया।

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