लखनऊ , जुलाई 25 -- ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन (एआईपीईएफ) ने विद्युत वितरण क्षेत्र में समानांतर वितरण लाइसेंस देने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए इसे बिजली वितरण व्यवस्था के "बैकडोर निजीकरण" की दिशा में कदम बताया है। फेडरेशन ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने यह प्रस्ताव लागू किया तो देश के 27 लाख बिजली कर्मचारी एवं इंजीनियर राष्ट्रव्यापी आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। एआईपीईएफ के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने शनिवार को जारी बयान में कहा कि विद्युत मंत्रालय की परामर्शदात्री समिति (कंसल्टेटिव कमेटी) में पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस का प्रस्ताव सार्वजनिक क्षेत्र की वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के हितों के प्रतिकूल है। उन्होंने आरोप लगाया कि सार्वजनिक धन से विकसित वितरण नेटवर्क का उपयोग निजी कंपनियों को करने की अनुमति देना सरकारी डिस्कॉम को आर्थिक रूप से कमजोर करने वाला कदम होगा।

उन्होंने कहा कि परामर्शदात्री समिति की बैठक के बाद विद्युत मंत्रालय द्वारा जारी बयान भ्रामक हैं और उनका उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र की वितरण कंपनियों तथा उपभोक्ताओं की कीमत पर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली नीति को उचित ठहराना है। उन्होने कहा कि मंत्रालय का यह दावा कि प्रस्तावित व्यवस्था से उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे और बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता में सुधार होगा, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। उनका तर्क था कि जब वितरण नेटवर्क का स्वामित्व, संचालन, रखरखाव और क्षमता विस्तार की जिम्मेदारी पूरी तरह सरकारी डिस्कॉम के पास ही रहेगी, तब केवल निजी कंपनी द्वारा बिलिंग किए जाने से बिजली आपूर्ति की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं हो सकता।

श्री दुबे ने कहा कि सेवा की गुणवत्ता वितरण नेटवर्क की मजबूती और विश्वसनीयता पर निर्भर करती है, न कि इस बात पर कि बिजली का बिल कौन जारी कर रहा है। उनके अनुसार प्रस्ताव का वास्तविक उद्देश्य सार्वजनिक धन से निर्मित सरकारी नेटवर्क का उपयोग कर निजी कंपनियों को व्यावसायिक लाभ पहुंचाना है।

एआईपीईएफ ने मुंबई को पैरेलल डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंस का सफल उदाहरण बताए जाने के विद्युत मंत्रालय के दावे को भी खारिज किया। दुबे ने कहा कि मुंबई का मॉडल प्रस्तावित व्यवस्था से भिन्न है, क्योंकि वहां विभिन्न लाइसेंसधारियों के कार्यक्षेत्र न्यायिक एवं नियामकीय व्यवस्था के तहत सीमित और अधिसूचित हैं। उन्होंने कहा कि इसे पूरे देश में प्रस्तावित व्यवस्था का उदाहरण नहीं माना जा सकता।

फेडरेशन ने कहा कि प्रस्ताव में कई महत्वपूर्ण प्रश्नों का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दिया गया है। इनमें वितरण नेटवर्क में खराबी आने पर जवाबदेही किसकी होगी, सरकारी डिस्कॉम द्वारा किए गए दीर्घकालिक विद्युत क्रय समझौतों (पीपीए) का वित्तीय बोझ कौन उठाएगा तथा सरकारी वितरण नेटवर्क के उपयोग के बदले निजी कंपनियां उसके रखरखाव और विस्तार पर होने वाले खर्च में किस प्रकार भागीदारी करेंगी, जैसे मुद्दे शामिल हैं।

एआईपीईएफ ने मांग की कि विद्युत मंत्रालय किसी भी निर्णय से पहले कर्मचारी एवं इंजीनियर संगठनों, उपभोक्ता संगठनों, राज्य विद्युत उपयोगिताओं तथा अन्य सभी संबंधित पक्षों के साथ व्यापक और सार्थक विचार-विमर्श करे।

फेडरेशन ने चेतावनी दी कि यदि सरकारी डिस्कॉम के वितरण नेटवर्क का उपयोग निजी कंपनियों को व्यावसायिक लाभ के लिए करने संबंधी कोई आदेश जारी किया गया, तो देश के 27 लाख बिजली कर्मचारी एवं इंजीनियर राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने के लिए बाध्य होंगे। संगठन ने कहा कि ऐसी स्थिति में उत्पन्न होने वाली औद्योगिक अशांति की पूरी जिम्मेदारी विद्युत मंत्रालय की होगी।

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