सीकर , मार्च 28 -- राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ किसनराव बागडे ने विश्वविद्यालयों को भारत का स्वर्णिम अवसर बताया है और कहा है कि विद्यार्थी प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा से जुड़कर नालंदा एवं तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों की तरह भारत का विश्वभर में गौरव बढ़ायें।
श्री बागडे शनिवार को पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारत का स्वर्णिम अवसर हमारे विश्वविद्यालय हैं। नयी शिक्षा नीति के आलोक में उन्हें सभी मिलकर उत्कृष्ट बनाने का प्रयास करें।
उन्होंने कहा कि देश में आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ गरीबी को शिक्षा के माध्यम से ही दूर किया जा सकता है। उन्होंने राजस्थान के शिक्षा क्षेत्र में योगदान देने वाले महानुभावों का स्मरण करते हुए कहा कि हीरालाल शास्त्री, स्वामी केशवानंद एवं सावित्री भाटी जैसे व्यक्तियों ने राजस्थान में शिक्षा को एक विशिष्ट स्थान दिलाया।
राज्यपाल ने कहा कि राजस्थान वीरों और वीरांगनाओं की पावन धरती है। यहीं से भारतीय सेना में सबसे अधिक जवान भर्ती होते हैं। शेखावाटी की यह धरती ऐतिहासिक रूप से देश की आर्थिक रीढ़ रही है। यहां के व्यापारियों ने देश के उद्योग-व्यापार जगत को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। बजाज, बिरला, अग्रवाल, मोदी समेत अनेक प्रमुख औद्योगिक घरानों की नींव इसी भूमि से जुड़ी है।
श्री बागडे ने कहा कि देश की आजादी से पूर्व घनश्याम दास बिड़ला ने महात्मा गांधी के साथ मिलकर देश में उद्योगों को प्रारंभिक रूप देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। राज्यपाल ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को याद करते हुए कहा कि वे व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने आप में एक संस्था और एक महान चिंतक थे। उनके द्वारा प्रतिपादित एकात्म मानववाद राष्ट्र को दी गयी अनूठी विरासत है। उनका मूल विचार था कि व्यक्ति से बड़ा समाज है।
उन्होंने दीक्षांत समारोह में विद्यार्थियों से कहा कि यह समारोह शिक्षा का अंत नहीं, बल्कि जीवन की नयी शुरुआत है। विद्यार्थी अपनी शिक्षा का उपयोग आमजन और राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए करें। राज्यपालने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में यूपीएससी और आरपीएससी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में छात्राओं की सफलता दर लगातार बढ़ रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि विद्यार्थियों में बौद्धिक क्षमता के साथ-साथ शारीरिक क्षमता का भी विकास आवश्यक है। प्राचीन भारत की गुरुकुल पद्धति की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि गुरुकुल में कला, इंजीनियरिंग, चरित्र निर्माण और नैतिक मूल्यों सहित सर्वांगीण शिक्षा प्रदान की जाती थी।
उन्होंने कहा कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए सहनशीलता अत्यंत जरूरी है। व्यक्ति तभी सफलता की ऊंचाइयों को छू पाता है। उन्होंने राजस्थान को कौशल की खान बताते हुए रणकपुर जैन मंदिर का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि इस अनुपम मंदिर को बारीकियों के साथ तैयार करने में पूरे 64 वर्ष लगे।
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