वाराणसी , सितंबर 27 -- पितृ पक्ष की शुरुआत रविवार को प्रतिपदा श्राद्ध के साथ हो गई। 16 दिनों तक चलने वाला यह पक्ष 10 अक्टूबर को अमावस्या के दिन समाप्त होगा। इस दौरान श्रद्धालु अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और मुक्ति की कामना के लिए वाराणसी के गंगा घाटों पर श्राद्ध, पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य कर रहे हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में पूर्वज सूक्ष्म रूप में धरती पर आते हैं और परिजनों की ओर से किए गए तर्पण एवं श्राद्ध कर्म को स्वीकार करते हैं।

दशाश्वमेध घाट के तीर्थ पुरोहित विवेकानंद पांडेय ने बताया कि पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों की तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं। काशी के पिशाचमोचन कुंड, दशाश्वमेध घाट, तुलसी घाट समेत अन्य घाटों पर पितृ पक्ष को लेकर लोगों की भीड़ उमड़ रही है।

मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए इन कर्मों से पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना भी की जाती है। पितृ पक्ष में सात्विक जीवन जीने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में लहसुन-प्याज, मांसाहारी भोजन और किसी भी प्रकार के नशे से परहेज करना चाहिए। लोग इस दौरान पूजा-पाठ, दान और धार्मिक गतिविधियों पर विशेष ध्यान देते हैं।

पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान नए वाहन, नया घर, नए कपड़े अथवा महंगी वस्तुओं की खरीदारी से बचा जाता है। इस अवधि में नए मांगलिक कार्य शुरू नहीं किए जाते और गृहप्रवेश जैसे शुभ आयोजनों को भी टाला जाता है।

श्री पांडेय ने बताया कि पितृ पक्ष के समापन पर सर्वपितृ अमावस्या के दिन उन सभी पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है, जिनकी श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध किसी कारण से नहीं हो पाया हो। इस दिन दान-पुण्य और तर्पण का विशेष महत्व माना जाता है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित