देहरादून , अक्तूबर 19 -- वनों का संरक्षण और पर्वतीय लोगों की समृद्धि एक-दूसरे के पूरक हैं। वन संरक्षण के प्रयास तभी प्रभावी हो सकते हैं, जब स्थानीय लोगों को इसका सहभागी बनाने के साथ उनकी आजीविका को भी प्राथमिकता दी जाए। यह बात सोमवार को उत्तराखंड के चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं वन मंत्री सुबोध उनियाल ने ग्राफिक एरा डीम्ड यूनिवर्सिटी में "पर्वतीय क्षेत्रों की पर्यावरणीय चुनौतियां" विषय पर सम्मेलन को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए कही।
श्री उनियाल ने कहा कि ऐसी जनहितैषी नीतियां तैयार करने की जरूरत है, जो वन संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाएं। उन्होंने भूमि की उत्पादकता बढ़ाने और आधुनिक तकनीक और उन्नत उपकरणों के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीकी नवाचार के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता है।
कुलपति प्रो. नरपिंदर सिंह ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़ी चुनौतियों में से एक कार्बन फुटप्रिंट से संबंधित सटीक आंकड़ों का अभाव है। उन्होंने कहा कि जब तक कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरण पर उसके प्रभाव से जुड़े विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध नहीं होंगे, तब तक प्रभावी नीतियां और समाधान तैयार करना चुनौतीपूर्ण रहेगा।
विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज के चेयर प्रोफेसर एवं एचएनबीजीयू के पूर्व कुलपति प्रो. एस. पी. सिंह ने कहा कि उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में वनाग्नि और मानव-वन्यजीव संघर्ष गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों के रूप में उभर रहे हैं। वनाग्नि के प्रभावी प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना और मानव-वन्यजीव संघर्ष के समाधान में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है।
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