श्रीनगर , मई 11 -- जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन ने सोमवार को नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) दोनों पर 'फिक्स्ड मैच' खेलने का आरोप लगाया तथा कहा कि इसी वजह से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज्यसभा की एक सीट जीतने में सफल रही और वह भी तब जब 2024 के विधानसभा चुनावों में इन दोनों दलों ने भाजपा विरोधी होने का दिखावा किया था।
श्री लोन ने आज यहां संवाददाता सम्मेलन में आरटीआई के जरिये हुए उन खुलासों का जिक्र किया , जिनमें राज्यसभा चुनाव के दौरान पोलिंग एजेंट की अनुपस्थिति की बात सामने आयी थी। उन्होंने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पीडीपी के आचरण को भाजपा की जीत से जोड़ने वाले बयानों पर भी सवाल उठाये।
श्री लोन ने कहा, "एजेंट का काम होता है कि सदस्य उसे अपना वोट दिखाये और फिर उसे डाले। एक आरटीआई में खुलासा हुआ है कि उन्होंने कोई एजेंट ही नहीं रखा था। इसका मतलब है कि तीनों सदस्यों ने अपनी मर्जी से वोट डाले, क्योंकि वहां जांचने वाला कोई नहीं था।"मुख्यमंत्री ने कहा था कि आरटीआई आने के बाद ही उन्हें इस मामले का पता चला। इस दावे पर श्री लोन ने सवाल उठाया, "क्या यह सच है कि एक वर्तमान मुख्यमंत्री को आरटीआई से इस बात का पता चला? विधानसभा अध्यक्ष आपके हैं। सचिव आपकी सरकार के अधीन हैं। सुरक्षा गार्डों से लेकर शीर्ष अधिकारियों तक सब आपकी सरकार ने तैनात किये हैं। क्या आपको आज तक यह नहीं पता था कि कोई एजेंट नहीं रखा गया था?"उन्होंने तर्क दिया कि विधानसभा के गणित ने ही उस 'राजनीतिक मिलीभगत' की पोल खोल दी है। उनका कहना था कि भाजपा की संख्या और उनके स्वयं के वोट को हटाकर भी शेष विधायकों के पास इतने आंकड़े थे कि वे मतों के संतुलित वितरण के जरिए आसानी से दोनों सीटें जीत सकते थे।
उन्होंने पूछा, "ये आठ वोट कहां से आये? और इन आठ वोटों ने उन्हें कैसे जिताया? कुछ ने अपना वोट खारिज कर दिया, और कुछ ने भाजपा को वोट दिया।" उन्होंने दावा किया कि एक पक्ष ने जानबूझकर एजेंट नियुक्त करने से परहेज किया, जबकि दूसरे पक्ष ने सुविधाजनक रूप से चुप्पी साधे रखी।
पत्रकारों से अपील करते हुए श्री लोन ने कहा, "चुनाव के दौरान आपने मुझसे दिन में 20 बार पूछा था कि क्या मैं भाजपा की 'बी-टीम' हूं। अब जाकर उनसे पूछिए कि भाजपा की असली बी-टीम कौन है।" उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के खिलाफ जो आक्रोश देखा गया था, वह तब गायब था जब उन्हीं पार्टियों ने उनके अनुसार भाजपा को जीत दिलाने में मदद की।
जम्मू-कश्मीर में आउटसोर्सिंग के मुद्दे पर बोलते हुए श्री लोन ने सरकार पर आरोप लगाया कि हजारों सरकारी नौकरियों को निजी एजेंसियों को हस्तांतरित कर सार्वजनिक रोजगार को व्यवस्थित रूप से नष्ट कर दिया गया। विधानसभा में मिले एक जवाब का हवाला देते हुए उन्होंने दावा किया कि लगभग 22,000 से 24,000 पदों को आउटसोर्स किया गया है, जिसमें सालाना लगभग 1,000 करोड़ रुपये का खर्च शामिल है।
उन्होंने श्रीमती महबूबा मुफ्ती को आउटसोर्सिंग की तुलना 'बैकडोर' नियुक्तियों से करने के प्रति आगाह किया और टिप्पणी की कि आउटसोर्सिंग 'बैकडोर नियुक्ति से दस लाख गुना अधिक जहरीली' है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यह यहां के युवाओं को पूरी तरह से बर्बाद कर देगा। पारंपरिक सरकारी नौकरियां किसी समय आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए सामाजिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती थीं। पहले ड्राइवरों, चपरासियों और क्लर्कों के पास पदोन्नति के अवसर होते थे और वे अपने बच्चों को इंजीनियर या सिविल सेवक बनाने के लिए शिक्षित कर सकते थे, जबकि नयी प्रणाली ने श्रमिकों को प्रभावी रूप से स्थायी असुरक्षा में फंसा दिया है।
श्री लोन ने कहा, "अब अगर आप चपरासी हैं, तो आप चपरासी ही रहेंगे। वे आपको केवल इतना ही देंगे कि आप मुश्किल से गुजारा कर सकें। आपका कोई भी बच्चा ट्यूशन नहीं पढ़ पायेगा।" उन्होंने आरोप लगाया कि आउटसोर्सिंग कंपनियां श्रमिकों को कम वेतन देकर भारी मुनाफा कमा रही हैं। उनके अनुसार सरकार प्रति कर्मचारी जितनी राशि का भुगतान करती है, उसकी तुलना में जमीन पर श्रमिकों तक पहुंचने वाली राशि बहुत कम है।
उन्होंने इस व्यवस्था को 'भ्रष्टाचार का अड्डा' बताते हुए टिप्पणी की, "कंपनी उन्हें 13,000 रुपये देती है, जबकि सरकार 20,000 या 25,000 रुपये से कहीं ज्यादा देती है। पांच हजार उनका मुनाफा है। बाकी कहां जाता है, यह आप भी जानते हैं।" उन्होंने आउटसोर्स किये गये कर्मचारियों की निगरानी में कमी पर भी सवाल उठाया और कहा कि हजारों कर्मियों की तैनाती के बावजूद उनकी वास्तविक नियुक्ति और कार्यप्रणाली को लेकर जवाबदेही बहुत कम है।
विशेष रूप से मिशन वात्सल्य योजना (जिसे पहले आईसीपीएस के नाम से जाना जाता था) के तहत कार्यों की आउटसोर्सिंग की आलोचना करते हुए श्री लोन ने बाल संरक्षण जैसी संवेदनशील जिम्मेदारियों को कम वेतन वाले संविदात्मक श्रमिकों को सौंपने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने पूछा, "वे बच्चों की मासूमियत को आउटसोर्स कैसे कर सकते हैं?" उन्होंने स्पष्ट किया कि यह योजना संघर्ष प्रभावित क्षेत्र में नाबालिगों के शोषण से संरक्षण, किशोर न्याय और बाल कल्याण जैसे मुद्दों से संबंधित है।
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