नयी दिल्ली , जुलाई 29 -- लोकसभा ने बुधवार को एक प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसमें संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का कार्यकाल शीतकालीन सत्र तक बढ़ाया गया है।
इससे समिति को प्रस्तावित 'एक देश, एक चुनाव' प्रक्रिया की जांच पूरी करने और संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए अतिरिक्त समय मिल गया है।
संयुक्त संसदीय समिति के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव के साथ मिलकर समिति को विचार-विमर्श पूरा करने और अपनी सिफारिशें पेश करने के लिए समय बढ़ाने का प्रस्ताव रखा, जिसे पारित कर दिया गया।
सदन द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया, "यह सदन 'संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024' पर संयुक्त समिति की रिपोर्ट पेश करने की समय-सीमा को अगले शीतकालीन सत्र के आखिरी सप्ताह के पहले दिन तक बढ़ाता है।"इस मंज़ूरी से समिति को हितधारकों के साथ बातचीत जारी रखने, प्रस्तावित सुधारों के संवैधानिक, कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं का आकलन करने और शीतकालीन सत्र के दौरान संसद में रिपोर्ट सौंपने से पहले उसे अंतिम रूप देने के लिए और समय मिल गया है।
संयुक्त संसदीय समिति दो अहम् विधेयकों की जांच कर रही है, जिनका मकसद लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराने का संवैधानिक और कानूनी ढांचा तैयार करना है।
संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 में देश भर में चुनावों को एक साथ कराने के लिए विधानसभाओं के कार्यकाल और चुनाव कराने से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव है। इसके साथ ही केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 में केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं से जुड़े कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव है, ताकि उन्हें एक साथ चुनाव कराने की प्रस्तावित व्यवस्था के अनुरूप बनाया जा सके।
केंद्र सरकार ने 'एक देश, एक चुनाव' पहल को एक अहम् चुनावी सुधार के तौर पर पेश किया है, जिसका मकसद बार-बार चुनाव कराने से रोकना और शासन में अधिक निरंतरता लाना है। सरकार के अनुसार, एक साथ चुनाव कराने से 'आदर्श आचार संहिता' बार-बार लागू होने से होने वाली रुकावटें कम होंगी, प्रशासनिक मशीनरी और सुरक्षा बलों की तैनाती बेहतर होगी, चुनाव से जुड़ा खर्च घटेगा और सरकारें कामकाज और विकास पर ज़्यादा ध्यान दे पाएंगी।
इस प्रस्ताव पर हालांकि ज़बरदस्त राजनीतिक और संवैधानिक बहस छिड़ गयी है। कई विपक्षी दलों ने इस पर चिंता जतायी है। उनका तर्क है कि एक साथ चुनाव कराने से भारत का संघीय ढांचा कमज़ोर हो सकता है, राज्य विधानसभाओं की स्वायत्तता पर असर पड़ सकता है और संसदीय लोकतंत्र में संवैधानिक एवं व्यावहारिक चुनौतियां पैदा हो सकती हैं, क्योंकि चुनी हुई सरकारें अपना तय कार्यकाल पूरा करने से पहले ही बहुमत खो सकती हैं।
संयुक्त संसदीय समिति अपनी सिफ़ारिशों को अंतिम रूप देने से पहले प्रस्तावित सुधारों के व्यापक असर की जांच करने के लिए संवैधानिक विशेषज्ञों, कानूनी जानकारों, चुनाव आयोग के पूर्व अधिकारियों, राजनीतिक दलों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ बातचीत कर रही है।
लोकसभा द्वारा मंज़ूरी दी गयी समय-सीमा बढ़ाने से समिति को दोनों विधेयकों की ज़्यादा विस्तृत जांच करने और शीतकालीन सत्र के दौरान एक व्यापक रिपोर्ट पेश करने में मदद मिलने की उम्मीद है। यह देश भर में एक साथ चुनाव कराने के लिए केंद्र के प्रस्तावित फ़्रेमवर्क पर संसद द्वारा आगे विचार किये जाने से पहले एक अहम पड़ाव होगा।
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