श्रीनगर , अक्टूबर 23 -- लद्दाख में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र पर नये सिरे से ध्यान देने की मांग करने वाले एक समूह के उभरने के बीच, केंद्र के साथ क्षेत्र की संवैधानिक और राजनीतिक मांगों पर बातचीत कर रही लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) ने केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) के साथ पिछली बैठकों से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक कर दिये हैं।
संगठन ने यह कदम पारदर्शिता और स्वतंत्र रूप से जन आकलन की आवश्यकता का हवाला देते हुए उठाया है। केंद्र सरकार और एलएबी तथा कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के प्रतिनिधियों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी है। ये संगठन लद्दाख के लिए अधिक स्वायत्तता तथा भूमि, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा सहित संवैधानिक संरक्षण की मांग कर रहे हैं।
एलएबी के अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लकरूक ने 71 पृष्ठों के दस्तावेज 'लद्दाख के लोगों से अपील' में कहा कि गृह मंत्रालय के साथ आदान-प्रदान किये गये दस्तावेजों और मसौदों को सार्वजनिक किया गया है, ताकि लोग बातचीत में हुई प्रगति, दर्ज की गयी प्रतिबद्धताओं और अब तक अनसुलझे मुद्दों का आकलन कर सकें। लद्दाख के नेताओं और गृह मंत्रालय के अधिकारियों के बीच बातचीत का पिछला दौर 17 अक्टूबर को लेह में हुआ था।
श्री लकरूक ने कहा, "एलएबी की ओर से लद्दाख के लोगों के सामने गृह मंत्रालय के साथ आदान-प्रदान किये गये संबंधित दस्तावेजों और मसौदों को रखना मैं अपनी जिम्मेदारी मानता हूं। हमें उम्मीद थी कि मुख्य सचिव का कार्यालय और गृह मंत्रालय व्यापक विचार-विमर्श तथा तथ्यों पर आधारित चर्चा के लिए इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करेंगे , हालांकि किसी कारणवश ऐसा नहीं हुआ। इसलिए एलएबी ने दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की पहल की है।" उन्होंने कहा कि जब लद्दाख का संवैधानिक और राजनीतिक भविष्य दांव पर हो, तब पारदर्शिता बेहद जरूरी है। सार्वजनिक बहस अफवाहों या चुनिंदा व्याख्याओं के बजाय तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए।
श्री लकरूक ने कहा, "हमारे लोगों को अफवाहों या चुनिंदा व्याख्याओं की नहीं, बल्कि तथ्यों की जरूरत है। ये दस्तावेज लोगों की जानकारी और स्वतंत्र आकलन के लिए उपलब्ध कराए जा रहे हैं।" उन्होंने नागरिकों से दस्तावेजों का अध्ययन करने और अपनी राय बनाने की अपील की।
एलएबी के बातचीत संबंधी रुख का बचाव करते हुए श्री लकरूक ने कहा कि सार्थक संवैधानिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक अधिकार हासिल करने के उसके प्रयासों को टकराव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, " लोगों के हितों की रक्षा के लिए हमारा दृढ़ रुख टकराव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। न्यायसंगत और स्थायी समाधान की मांग करना टकराव नहीं, बल्कि लद्दाख के लोगों के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।" उन्होंने लोगों से प्रस्तावों के बीच के अंतर का अध्ययन करने और बातचीत में हुई प्रगति का आकलन करने का आग्रह किया।
इन दस्तावेजों में केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) और लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) तथा कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) की ओर से संयुक्त रूप से पेश किए गए प्रस्तावों के बीच के अंतर को बताया गया है।
एलएबी के अनुसार, एमएचए ने नौ सितंबर को संविधान के अनुच्छेद 240 के तहत प्रस्तावित केंद्र शासित प्रदेश स्तर की संस्था की शक्तियों से संबंधित प्रस्ताव पेश किये थे। उपसमिति के सदस्यों ने इन प्रस्तावों को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था। इसके विपरीत एलएबी और केडीए के संयुक्त प्रस्ताव में प्रस्तावित अनुच्छेद 371के के तहत विशेष संवैधानिक प्रावधान की मांग की गयी है। इसमें सीधे निर्वाचित विधानसभा और मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार का प्रावधान करने की बात कही गई है, जिसके पास विधायी, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार हों।
प्रस्ताव में सरकारी अधिकारियों पर प्रशासनिक नियंत्रण के साथ-साथ भूमि, प्राकृतिक संसाधनों, स्थानीय निवासियों के दर्जे, सरकारी नौकरियों, शिक्षा, संस्कृति और भाषाओं के लिए संवैधानिक सुरक्षा की भी मांग की गयी है। इसमें लद्दाख के लिए अलग सिविल सेवा कैडर और स्वतंत्र लोक सेवा आयोग गठित करने का भी प्रस्ताव है।
श्री लाक्रुक ने कहा कि तीन जुलाई की बैठक में विशेष संवैधानिक प्रावधान और नौकरशाही पर नियंत्रण रखने वाली केंद्र शासित प्रदेश स्तर की विधायी संस्था की आवश्यकता पर सहमति दर्ज की गयी थी।
प्रस्तावित संयुक्त घोषणा में केंद्र से संसद में संविधान संशोधन विधेयक पेश करने का आह्वान किया गया है। इसका उद्देश्य दिसंबर 2026 में शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान विधेयक को पारित कराना है।
सरकार के साथ जारी बातचीत के बीच लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) के पूर्व अध्यक्ष थुपस्तान छेवांग के नेतृत्व में नवगठित लद्दाख सिविल सोसाइटी फोरम ने भारत सरकार के साथ बातचीत की मौजूदा स्थिति पर चिंता जतायी है। लेह में हुई बैठक में शामिल इस फोरम में धार्मिक नेता, रिनपोछे, मठों और धार्मिक संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाले भिक्षु, बुद्धिजीवी, सेवानिवृत्त आईएएस और केएएस अधिकारी तथा पूर्व और वर्तमान सांसद, विधायक, मुख्य कार्यकारी पार्षद और पार्षद शामिल हैं। फोरम ने एलएबी और केडीए पर लगातार बातचीत टालने और भारत सरकार के साथ बनी सहमति की अनदेखी करने का आरोप लगाया। उसने यह भी आरोप लगाया कि भूमि, रोजगार और सांस्कृतिक सुरक्षा से जुड़ा मूल एजेंडा पीछे छूट गया है। फोरम का दावा है कि बातचीत की मौजूदा दिशा को सोनम वांगचुक ने अपने प्रभाव में ले लिया है और इसमें केडीए का दबदबा बढ़ गया है। इससे अलग-अलग जिलों और बौद्ध समुदाय के हितों से समझौता हो रहा है।
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