नयी दिल्ली , सितंबर 23 -- प्राचीन भारतीय चिकित्सा ज्ञान परंपरा के शास्त्रीय एवं चिकित्सकीय पक्षों को समकालीन संदर्भों में समझने के उद्देश्य से बुधवार को यहां 'रेवती कल्प राष्ट्रीय संगोष्ठी' में वक्ताओं ने कहा कि आयुर्वेद की मूल अवधारणाओं को समझने के लिए संस्कृत भाषा, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांगहृदय जैसे मूल ग्रंथों का प्रामाणिक एवं गहन अध्ययन आवश्यक है।
कल्पतंत्र वैद्य गुरुकुल एवं रिसर्च फाउंडेशन द्वारा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय भारतीय चिकित्सा पद्धति आयोग तथा वैदिक वेदान्तिक स्टडीज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के सहयोग से आयोजित संगोष्ठी में आयुर्वेद परीक्षा एवं तंत्र अभ्यास सीरीज-1 का शुभारंभ हुआ, जिसमें देशभर से 250 से अधिक चिकित्सकों, शोधार्थियों एवं विद्वानों ने सहभागिता की। संगोष्ठी में रेवती कल्प सहित आयुर्वेद की विभिन्न शास्त्रीय अवधारणाओं के वैज्ञानिक, चिकित्सकीय एवं व्यावहारिक पक्षों पर शोधपरक चर्चा हुई।
उद्घाटन सत्र का शुभारंभ परम पूज्य श्री श्री विश्वप्रसन्नतीर्थ स्वामी महाराज के आशीर्वचन से हुआ। इस अवसर पर भारतीय ज्ञान प्रणाली के मुख्य अकादमिक अधिकारी वैद्य डॉ. रघुराम भट, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. आर.जी. मुरली कृष्ण, कल्पतंत्र वैद्य गुरुकुल एवं रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक डॉ. के. गिरिधर तथा वैदिक वेदान्तिक स्टडीज एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. विठोबाचार्य सहित अनेक विशेषज्ञ उपस्थित रहे।
संगोष्ठी में रेवती कल्प को आयुर्वेद के बाल एवं मातृ स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण शास्त्रीय संदर्भ के रूप में प्रस्तुत किया गया। चर्चा में बताया गया कि इसमें गर्भावस्था से लेकर जन्म के बाद प्रारंभिक शैशव अवस्था तक की संवेदनशील स्थितियों का उल्लेख मिलता है। परंपरागत रूप से इसे भूतविद्या के अंतर्गत रखा गया है, जबकि संगोष्ठी में इसके चिकित्सकीय संदर्भों की पुनर्व्याख्या पर विचार किया गया। वक्ताओं ने शिशु के आहार ग्रहण न करने, अत्यधिक रोने, नींद में व्यवधान, अपेक्षित वजन न बढ़ने तथा बार-बार बीमार पड़ने जैसी स्थितियों को शास्त्रीय विवरणों के संदर्भ में समझने की आवश्यकता बताई। मातृ स्वास्थ्य, पर्यावरणीय प्रभाव और जन्मोत्तर संक्रमणकालीन तनाव जैसे कारकों पर भी चर्चा हुई।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता कल्पतंत्र वैद्य गुरुकुल एवं रिसर्च फाउंडेशन के संस्थापक आचार्य महानिधि ने रेवती कल्प पर छह वर्षों के शोध के निष्कर्ष प्रस्तुत किये। उन्होंने नयी पीढ़ी, विशेषकर जेनरेशन-जी, से संहिता अध्ययन और संस्कृत में दक्षता विकसित करने का आह्वान किया।
समापन सत्र में मुख्य अतिथि योगऋषि स्वामी रामदेव तथा केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने विचार व्यक्त किये। स्वामी रामदेव ने गुरु-शिष्य परंपरा को ज्ञान के संरक्षण और हस्तांतरण की आधारभूत व्यवस्था बताते हुए कहा कि गुरु के साथ संबंध जीवन के अत्यंत स्थायी और अमूल्य संबंधों में है। उन्होंने चिकित्सकों से ज्ञान, साधना और समर्पण के साथ आगे बढ़ने का आह्वान किया।
प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने कहा कि आयुर्वेद के शैक्षिक और शास्त्रीय आधार को मजबूत करने के लिए गहन संहिता अध्ययन तथा संस्कृत की व्यापक समझ आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मूल ग्रंथों के अध्ययन के बिना आयुर्वेद की अवधारणाओं को उनके संदर्भ और व्यापकता में समझना कठिन है। परम पूज्य श्री श्री विश्वप्रसन्नतीर्थ स्वामीजी ने भी आयुर्वेद के साथ संस्कृत एवं मूल संहिताओं के संरक्षण की जिम्मेदारी पर बल दिया। इस अवसर पर अखिल भारतीय शतरंज महासंघ के उपाध्यक्ष एवं पूर्व टीटीडी बोर्ड सदस्य डॉ. डी. पी. अनंत आचार्य भी उपस्थित रहे।
आचार्य महानिधि ने शास्त्रीय आयुर्वेद अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए 'सुवर्ण धन्वंतरि राष्ट्रीय पुरस्कार' की घोषणा की जिसमें स्वर्ण जड़ित हस्तनिर्मित धन्वंतरि प्रतिमा के साथ नकद पुरस्कार दिया जाएगा। चयन प्रक्रिया में अष्टावधान शैली की परीक्षा, मुखोद्गत संहिता अध्ययन, व्याख्या लेखन, औषध निर्माण तथा आयुर्वेदिक पाक-कौशल जैसी दक्षताओं का बहुस्तरीय परीक्षण किया जाएगा। प्रथम पुरस्कार वैद्य डॉ. महेश व्यास, डीन, अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान, नयी दिल्ली तथा डॉ. राममनोहर पुथियेदथ, रिसर्च डायरेक्टर एवं प्रोफेसर, अमृता स्कूल ऑफ आयुर्वेद को प्रदान किया गया।
संगोष्ठी में आयुर्वेद परीक्षा एवं तंत्र अभ्यास पहल की शुरुआत की गयी। इसके अंतर्गत संस्थागत, क्षेत्रीय, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर अकादमिक संवाद आयोजित किये जाएंगे। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अष्टांगहृदय को केंद्र में रखकर चिकित्सकीय जटिलताओं तथा अस्पष्ट परिस्थितियों से संबंधित शास्त्रीय अवधारणाओं का अध्ययन और व्यावहारिक संदर्भों में परीक्षण किया जायेगा।
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