लखनऊ , मार्च 31 -- रेटिनोब्लास्टोमा से पीड़ित छोटे बच्चों के उपचार में किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) ने नई उम्मीद जताई है। संस्थान की तरफ से किए गए एक शोध में थ्रीडी प्रिंटिंग तकनीक से तैयार कस्टमाइज्ड पीएलए (पोलिलैक्टिक एसिड ) ऑर्बिटल इम्प्लांट उन बच्चों में आत्मविश्वास जगायेगा, जो नेत्रविहीन हैं।
नेत्र रोग विभाग की एम.एस. छात्रा डॉ. शिवानी सुरेश द्वारा द्वारा किया गया यह शोध, उन बच्चों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है, जिनकी आंख कैंसर या अन्य कारणों से निकालनी पड़ती है। ऐसे मामलों में आंख न होने से चेहरे की बनावट (कॉस्मेटिक अपीयरेंस) पर असर पड़ता है। इस दिशा शोधकर्ताओं द्वारा विकसित थ्रीडी प्रिंटेड इम्प्लांट इस समस्या का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है।
रिसर्च के अनुसार, यह इम्प्लांट न केवल सुरक्षित है, बल्कि पारंपरिक (कन्वेंशनल) इम्प्लांट की तुलना में अधिक सटीक फिटिंग देता है, जिससे जटिलताओं का खतरा भी कम हो जाता है। सबसे खास बात यह है कि इसकी लागत बेहद कम करीब 10 रुपये से भी कम बताई गई है, जबकि बाजार में उपलब्ध पारंपरिक इम्प्लांट की कीमत 1500 से 2500 रुपये तक होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भारत जैसे देशों में स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ और किफायती बना सकती है, खासकर उन मरीजों के लिए जो महंगे इलाज का खर्च वहन नहीं कर पाते। इस शोध को प्रो. संजीव कुमार गुप्ता के मार्गदर्शन में किया गया है। जबकि सह-मार्गदर्शकों में डॉ. अरुण कुमार शर्मा, प्रो. सिद्धार्थ अग्रवाल और डॉ. विशाल कटियार का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
गौरतलब है कि जब किसी कारण (जैसे ट्रॉमा या कैंसर सर्जरी) से आंख निकालनी पड़ती है, तो आंख की जगह एक खाली कैविटी बन जाती है। इस स्थिति में केवल आर्टिफिशियल आंख लगाने से संतोषजनक कॉस्मेटिक सुधार नहीं मिल पाता। ऐसे में ऑर्बिटल इम्प्लांट लगाया जाता है, जो आंख की जगह को भरता है और चेहरे की संरचना को सामान्य बनाए रखने में मदद करता है। इसके ऊपर आर्टिफिशियल आंख फिट की जाती है, जिससे मरीज का लुक काफी हद तक सामान्य दिखता है। अब तक ये इम्प्लांट आमतौर पर ऐक्रेलिक या सिलिकॉन से बनते थे, लेकिन केजीएमयू का यह थ्रीडी प्रिंटेड पीएलए इम्प्लांट सस्ता, कस्टमाइज्ड और अधिक प्रभावी विकल्प बन सकता है।
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