हैदराबाद , सितंबर 12 -- बायोएग्री इनपुट प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (बीआईपीए) ने शनिवार को जैविक उत्पादों के वैज्ञानिक समावेशन से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग में चरणबद्ध तरीके से 25 प्रतिशत की कटौती करने का आह्वान किया है।
एसोसिएशन के अनुसार, इस कदम से देश के खजाने को प्रतिवर्ष लगभग 40,000 करोड़ रुपये की भारी बचत हो सकती है।
बीआईपीए के अनुसार, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करने से न केवल किसानों की लागत में कमी आएगी, बल्कि मिट्टी की सेहत में सुधार होगा, आयात पर निर्भरता घटेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय कृषि निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता भी मजबूत होगी।
यहां आयोजित छठे वार्षिक बायोएग्री इंडस्ट्री समिट 'बॉयोएग्री 2026' के पूर्वावलोकन कार्यक्रम में एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने यह प्रस्ताव रखा। इस दौरान बीआईपीए के अध्यक्ष ए. जॉन पीटर, सहित अन्य अधिकारी मौजूद थे। यह सम्मेलन आगामी 7 और 8 अक्टूबर को यहां रामोजी फिल्म सिटी में आयोजित होगा।
अध्यक्ष ए. जॉन पीटर ने स्पष्ट किया कि जैव-उर्वरक, जैव-उद्दीपक और जैव-कीटनाशक जैसे जैविक उत्पादों को रासायनिक इनपुट्स के पूर्ण विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि उनके पूरक के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने कहा, "भारत को पूरी तरह से रसायनों पर निर्भर कृषि मॉडल से हटकर एक एकीकृत प्रणाली की ओर बढ़ना चाहिए, जहाँ जैविक और रासायनिक उत्पाद वैज्ञानिक और जिम्मेदार तरीके से मिलकर काम करें।"एसोसिएशन के अनुसार देश में सालाना लगभग 3.5 करोड़ टन यूरिया की खपत होती है और डीएपी, पोटाश तथा अन्य उर्वरकों के लिए आवश्यक कच्चे माल के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। देश का वार्षिक उर्वरक सब्सिडी बिल 1.75 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच चुका है, ऐसे में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग घटाने से सरकारी सब्सिडी के बोझ और विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिलेगी।
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