नयी दिल्ली , जून 29 -- आदिवासियों की तरक्की और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए कार्यरत गैर सरकारी संगठन हाईरेंज रूरल डेवलपमेंट सोसाइटी (एचआरडीएस) के सचिव अजी कृष्णन ने विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) में किये गये संशोधनों को देशभर में तत्काल प्रभाव से लागू करने की मांग की है।

उन्होंने सोमवार को यहां जारी एक बयान में कहा कि (एफसीआरए) भारत में विदेशी देशों एवं संस्थाओं से प्राप्त होने वाले आर्थिक सहयोग (विदेशी अंशदान) को विनियमित करने के लिए बनाया गया कानून है। जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का उपयोग देश की राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता तथा जनहित के विरुद्ध न हो।

श्री कृष्णन ने कहा कि एफसीआरए संशोधन विधेयक का कुछ ईसाई चर्च नेताओं द्वारा किया जा रहा विरोध पूरी तरह प्रेरित और दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने आरोप लगाया कि पन्द्रहवीं शताब्दी से पुर्तगालियों के नेतृत्व में विदेशी ईसाई प्रभाव भारत में बढ़ा और विदेशी शक्तियों ने भारत के संसाधनों तथा संपत्ति का व्यापक दोहन किया। उन्होंने यह भी दावा किया कि अनेक हिंदू मंदिरों को नष्ट किया गया तथा कोच्चि और गोवा जैसे क्षेत्रों में औपनिवेशिक शक्तियों ने अपने प्रभुत्व स्थापित किये।

उन्होंने कहा कि मिशनरी भारत में धर्मांतरण के उद्देश्य से आये थे और उन्होंने भारतीय संस्कृति, परंपरा एवं विरासत को पश्चिमी धार्मिक मान्यताओं से बदलने का प्रयास किया। उनके अनुसार, पोप द्वारा नियुक्त बिशप वेटिकन के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हैं और देश में चर्च के नियमों को लागू करते हैं।

श्री कृष्णन ने आरोप लगाया कि पूर्वोत्तर भारत के ईसाई बहुल राज्यों, जैसे मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम और मेघालय में लंबे समय से अशांति का वातावरण रहा है तथा विदेशी सहायता का उपयोग राष्ट्रविरोधी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए किया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ क्षेत्रों में चर्च संगठनों ने उग्रवादी समूहों के साथ सहयोग किया तथा विदेशी वित्तपोषित ईसाई प्रचार गतिविधियों का विस्तार हुआ।

उन्होंने कहा कि जबरन एवं धोखे से कराये जाने वाले धर्मांतरण भारत की एकता और सामाजिक समरसता के लिए गंभीर खतरा हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ लोग धर्म की स्वतंत्रता को संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार बताते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने का अधिकार देता है, लेकिन किसी प्रकार का दबाव, प्रलोभन या छलपूर्वक कराया गया धर्मांतरण संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है।

उन्होंने कहा कि देश के कई राज्यों ने जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए धर्मांतरण विरोधी कानून बनाये हैं और उच्चतम न्यायालय भी जबरन धर्मांतरण को स्वीकार्य नहीं मान चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि चर्च द्वारा संचालित कुछ शैक्षणिक संस्थान, अस्पताल और सेवा संस्थाएं धर्मांतरण के केंद्र के रूप में कार्य कर रही हैं तथा व्यापक मीडिया नेटवर्क का उपयोग धार्मिक प्रचार के लिए किया जा रहा है।

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