नागपुर , अक्टूबर 20 -- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि संघ पिछले 100 वर्षों से राष्ट्रीय आत्म-जागरूकता जगाने और भारत की सांस्कृतिक पहचान एवं इतिहास के आधार पर उसकी एकता को मजबूत करने के लिए काम कर रहा है।

इससे पहले श्री भागवत ने नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय में विजयादशमी के अवसर पर शस्त्र पूजा की।

संघ मुख्यालय में वार्षिक विजयादशमी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए श्री भागवत ने कहा कि अपने पारंपरिक मूल्यों और लोगों को जोड़ने वाले भावनात्मक बंधन को भूलने के बाद भारत ने पतन का सामना किया और सदियों तक विदेशी पराधीनता को झेला।

इस अवसर पर दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्ता ने भी भारतीय पहचान को मजबूत करने में आरएसएस की भूमिका की सराहना की।

उन्होंने कहा कि भारत अपार विविधताओं वाला देश है, जहां अलग-अलग धर्मों, क्षेत्रों, जातियों, भाषाओं, खान-पान की आदतों और रीति-रिवाजों के लोग रहते हैं। उन्होंने कहा कि इन सभी विविधताओं का सम्मान करने, उनकी रक्षा करने और उनकी गरिमा बनाए रखने वाले एक मूलभूत सिद्धांत की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा, "सौभाग्य से, हमें अपनी परंपरा के माध्यम से ऐसा दर्शन विरासत में मिला है।" उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत की प्राचीन सभ्यतागत विचारधारा सृष्टि की स्वाभाविक विविधता के साथ-साथ समस्त अस्तित्व की एकता के शाश्वत सत्य को भी मान्यता देती है।श्री भागवत ने कहा कि देश की परंपरा पूरे अस्तित्व के आपस में जुड़े होने के अनुभव पर आधारित है और लोगों को अपनेपन तथा पारस्परिक सम्मान की भावना के साथ जीने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि इस सत्य को महसूस करना और इसे अपने जीवन में उतारना ही स्थायी सुख प्राप्त करने का मार्ग है।

आरएसएस के शताब्दी समारोह का उल्लेख करते हुए श्री भागवत ने कहा कि संगठन के कार्य का मूल उद्देश्य 'स्वबोध' जगाना और भारत को उसकी पहचान तथा इतिहास के आधार पर मजबूत करना है।

उन्होंने प्रांत संघचालक के परिचयात्मक वक्तव्य में उल्लिखित 'पंच परिवर्तन' पहल का भी जिक्र किया और कहा कि स्वबोध तथा स्वदेशी आचरण को बढ़ावा देना इसके प्रमुख घटकों में शामिल है।

श्री भागवत ने कई सामाजिक और आध्यात्मिक हस्तियों के योगदान को याद किया जिनकी जयंती या स्मृति वर्ष मनाए जा रहे हैं। इनमें संत रविदास (जिनकी 650वीं जयंती मनाई जा रही है), स्वामी श्रद्धानंद (जिनकी शहादत के 100 वर्ष पूरे हुए हैं) और स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती (जिनकी जन्म शताब्दी मनाई जा रही है) शामिल हैं। उन्होंने महात्मा ज्योतिराव फुले के 200वें जन्म जयंती वर्ष का भी उल्लेख किया जो 11 अप्रैल से शुरू हुआ, तथा बंगाल के श्रीमद् राजनारायण बसु का भी जिक्र किया, जिन्होंने स्वदेशी मेलों के माध्यम से सामाजिक संगठन और स्वदेशी पहचान की जागरूकता को बढ़ावा दिया।

श्री भागवत ने कहा कि संत रविदास ने उस दौर में अपने धर्म के प्रति निष्ठा, सामाजिक समरसता और भक्ति का प्रचार किया जब लोग विदेशी आक्रांताओं के अधीन उत्पीड़न का सामना कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अपने जीवन और उपदेशों के माध्यम से उन्होंने समाज में साहस और विश्वास का संचार किया। उन्होंने कहा कि आर्य समाज के प्रमुख संन्यासी, शिक्षाविद, शुद्धि आंदोलन के प्रणेता और स्वतंत्रता सेनानी स्वामी श्रद्धानंद ने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी। उन्होंने कहा कि स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने बलिदान होने से पहले ओडिशा में जनजातीय समुदायों की सेवा करने और उनमें धर्म के प्रति जागरूकता जगाने में अपना जीवन समर्पित कर दिया था।

संघ प्रमुख ने कहा कि अनगिनत महान विभूतियों के प्रयासों और बलिदानों ने भारत को स्वतंत्रता प्राप्त करने तथा एकता और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने में मदद की। वर्तमान परिस्थितियां हालांकि देश की एकता को बनाए रखने और मजबूत करने के लिए और भी अधिक समर्पण तथा प्रयास की मांग करती हैं।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संविधान की प्रस्तावना में 'हम, भारत के लोग' शब्दों के माध्यम से परिलक्षित भारत के भावनात्मक बंधन को दैनिक आचरण के माध्यम से समझने और मजबूत करने की आवश्यकता है।

श्री भागवत ने कहा कि देश की विविधता का सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए, जबकि राष्ट्रीय पहचान की साझी भावना सर्वोपरि रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जब लोग इस साझा बंधन को भूल जाते हैं, तो समाज विभाजित और कमजोर हो जाता है।

इस मौके पर दैनिक जागरण के प्रधान संपादक संजय गुप्ता ने वैश्विक स्तर पर भारतीय पहचान और हिंदुत्व को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का श्रेय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को दिया और कहा कि नागरिकों के बीच चरित्र निर्माण अगली शताब्दी में इसकी प्रमुख चुनौती होगी।

श्री गुप्ता ने कहा कि संघ 100 वर्ष पूरे करने के बाद अगली शताब्दी में सतत सामाजिक परिवर्तन लाने और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि भारत आर्थिक मोर्चे पर तेजी से प्रगति कर रहा है और अगले 20-25 वर्षों में एक समृद्ध राष्ट्र के रूप में उभर सकता है लेकिन उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आर्थिक समृद्धि से सामाजिक चेतना और नैतिक मूल्यों में भी तदनुरूप सुधार होगा।

जाति, संप्रदाय, वर्ग और धर्म के आधार पर विभाजनों की ओर इशारा करते हुए श्री गुप्ता ने कहा कि देश को असहिष्णुता, सामाजिक बुराइयों तथा अनुशासन और नागरिक जिम्मेदारी की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने कहा, "केवल यह पूछने के बजाय कि देश हमें क्या देता है, नागरिकों को राष्ट्र में योगदान देना भी सीखना चाहिए,"श्री गुप्ता ने कहा कि सामाजिक सुधार लाने की जिम्मेदारी राजनीतिक दलों की भी है लेकिन वोट-बैंक की राजनीति और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं अक्सर ऐसे प्रयासों में बाधा डालती हैं। इस संदर्भ में, उन्होंने जोर देकर कहा कि आरएसएस और उसकी विचारधारा से प्रेरित संगठनों की काफी प्रासंगिकता बनी हुई है।

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