सिलीगुड़ी , मार्च 07 -- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शनिवार को स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समुदायों, विशेष रूप से संथालों के इतिहास और योगदान का उचित दस्तावेजीकरण का आह्वान किया।
सुश्री मुर्मु ने बागडोगरा के पास आयोजित 'अंतरराष्ट्रीय संथाल परिषद' के नौवें सम्मेलन को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने संथाल समुदाय के सामने आ रही विकास की कमियों और शैक्षिक चुनौतियों पर गहरी चिंता जतायी।
सम्मेलन में शामिल होने के बाद राष्ट्रपति ने बिधाननगर के उस स्थान का दौरा किया, जहां पहले यह कार्यक्रम होना तय था। स्थानीय निवासियों से बात करते हुए कहा कि उन्हें सूचित किया गया था कि पर्याप्त जगह होने के बावजूद उस स्थान पर सम्मेलन आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गयी। उन्होंने कहा, 'मैं इसका कारण नहीं जानती', साथ ही यह भी कहा कि उन्हें इस मामले को लेकर कोई शिकायत नहीं है।
बागडोगरा के पास 'भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण' की जमीन पर आयोजित कार्यक्रम में श्रीमती मुर्मू ने कहा कि ऐसी घटनाएं जो लोगों को सम्मेलन में आने से रोकती हैं, किसी अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम के लिए उचित नहीं हैं। उन्होंने कहा, "ऐसा लगता है कि कुछ लोग नहीं चाहते कि संथाल समुदाय एकजुट हो, आगे बढ़े और मजबूत बने।"राष्ट्रपति ने संथाल समुदाय की पहचान, विरासत और ऐतिहासिक संघर्षों पर चर्चा की और उनका उल्लेख देश के सामाजिक-राजनीतिक विकास के संदर्भ में किया।
उन्होंने कहा कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में संथाल समुदाय का त्याग और योगदान पूरे देश के लिए गर्व की बात है। ऐतिहासिक 'संथाल विद्रोह' का ज़िक्र करते हुए उन्होंने सिद्धू मुर्मू और कान्हू मुर्मू की भूमिका को याद किया। उन्होंने अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि मुख्यधारा के इतिहास में आदिवासी समुदायों के योगदान का उस तरह से दस्तावेजीकरण नहीं किया गया है, जिसके वे हकदार थे।
सुश्री मुर्मु ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे इतिहास को दुनिया के सामने लाने की जरूरत है। उन्होंने आदिवासी समुदायों के संघर्षों तथा बलिदानों को सहेजने के लिए और भी बड़े स्तर पर कोशिशें करने का आह्वान किया।
शिक्षा की अहमियत पर बात करते हुए उन्होंने 'ओल चिकी' लिपि में पढ़ाई को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने समुदाय के युवाओं से अपील की कि वे अपनी मातृभाषा के साथ-साथ दूसरी भाषाओं में भी शिक्षा हासिल करें। इसके साथ ही उन्होंने क्षेत्र में आदिवासी छात्रों के लिए चल रहे आवासीय स्कूलों और अन्य शिक्षण संस्थानों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाये।
उन्होंने गौरव के साथ बताया कि संताली भाषा ने कई ऐसे काबिल लेखक दिये हैं, जिन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार , पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया है। उन्होंने हालांकि यह भी कहा कि उनके योगदान को अक्सर वह पहचान नहीं मिल पाती, जिसके वे हकदार हैं।
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