नयी दिल्ली , मार्च 05 -- भारत की वैश्विक विज्ञान कूटनीति को नयी दिशा देने के उद्देश्य से रायसीना विज्ञान कूटनीति पहल (एसडीआई) के प्रथम संस्करण का आयोजन गुरुवार को भारत मंडपम में किया गया। यह पहल प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) द्वारा संयुक्त रूप से रायसीना संवाद के अंतर्गत शुरू की गयी।
कार्यक्रम की अध्यक्षता भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार अजय कुमार सूद ने की। सह-अध्यक्षों में पीटर ग्लुकमैन, जो अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद के अध्यक्ष हैं, मैरीलीन एंडरसन, जो जिनेवा साइंस एंड डिप्लोमेसी एंटीसिपेटर की महानिदेशक हैं, और विजय चौथाईवाले शामिल रहे।
इस पहल के पहले संस्करण का मुख्य फोकस 'रणनीतिक स्वायत्तता' और 'परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों' से जुड़ी शासन संबंधी चुनौतियों पर रहा। कार्यक्रम में विश्वभर के लगभग 80 वैज्ञानिकों, नवप्रवर्तकों, राजनयिकों, नीति निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक को गोपनीय (क्लोज्ड-डोर) प्रारूप में आयोजित किया गया ताकि प्रतिभागियों के बीच खुली और गंभीर चर्चा हो सके।
उद्घाटन सत्र में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि आज के वैश्विक परिदृश्य में विज्ञान और प्रौद्योगिकी राष्ट्रीय विकास, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक प्रगति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुके हैं। ओआरएफ के अध्यक्ष समीर सरन ने कहा कि रायसीना एसडीआई को विज्ञान कूटनीति के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में विकसित किया गया है, जो विभिन्न देशों और संस्थानों के दृष्टिकोणों को एक साथ लाने का प्रयास करेगा।
कार्यक्रम में पहली गोलमेज चर्चा 'रणनीतिक स्वायत्तता के युग में विज्ञान कूटनीति' विषय पर आयोजित हुई। इसकी अध्यक्षता परविंदर मैनी ने की। इस चर्चा में प्रतिभागियों ने इस बात पर बल दिया कि बदलते भू-राजनीतिक माहौल में भी वैज्ञानिक सहयोग देशों के बीच विश्वास का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है। चर्चा में पारदर्शी शोध तंत्र विकसित करने, वैज्ञानिक नेटवर्क को मजबूत बनाने और बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
दूसरी गोलमेज चर्चा का विषय 'परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकियों की शासन और विज्ञान कूटनीति' था। इसकी अध्यक्षता मैरीलीन एंडरसन ने की, जबकि प्रारंभिक विचार विजय चौथाईवाले ने प्रस्तुत किए। चर्चा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और अन्य अग्रणी तकनीकों के लिए न्यायसंगत और प्रभावी शासन मॉडल विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि नई प्रौद्योगिकियों के लाभ को समाज तक पहुंचाने के साथ-साथ उनसे जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए वैश्विक स्तर पर समन्वित दृष्टिकोण आवश्यक है।
कार्यक्रम में जाह्नवी फाल्के, निदेशक, साइंस गैलरी बेंगलुरु ने 'विज्ञान कूटनीति का ऐतिहासिक विकास' विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि समय के साथ विज्ञान कूटनीति का दायरा केवल राष्ट्र-राज्यों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें कई संस्थान और संगठन भी शामिल हो गए हैं। वहीं स्टीन सोंडरगार्ड, मुख्य वैज्ञानिक, नाटो ने प्रौद्योगिकी संबंधी दूरदर्शिता के वैश्विक प्रभावों पर विचार साझा किए।
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