रायपुर , अक्टूबर 13 -- छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का पुरानी बस्ती क्षेत्र प्राचीन देवी मंदिरों, धार्मिक मान्यताओं और सदियों पुरानी पूजा परंपराओं के लिए विशेष पहचान रखता है। शहर के लगभग दो किलोमीटर के दायरे में स्थित पांच प्रमुख देवी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र हैं, जहां प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। इन मंदिरों का इतिहास अलग-अलग कालखंडों से जुड़ा बताया जाता है और प्रत्येक मंदिर की स्थापना को लेकर स्थानीय स्तर पर विशिष्ट मान्यताएं प्रचलित हैं।
राजधानी के इन धार्मिक स्थलों में महामाया देवी मंदिर, दंतेश्वरी मंदिर, कंकाली मठ और शीतला माता मंदिर प्रमुख हैं। इनमें कहीं देवी की प्रतिमा की स्थापना से जुड़ी पौराणिक कथा प्रचलित है, तो कहीं स्वयंभू पिंड की पूजा होती है। कुछ मंदिर अपनी अनूठी पूजा पद्धति और पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक परंपराओं के कारण विशेष महत्व रखते हैं।
पुरानी बस्ती स्थित मां महामाया देवी मंदिर रायपुर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास 5000 साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है। मंदिर की स्थापना से जुड़ी कथा राजा मोरध्वज और उनकी रानी कुमुददेवी से संबंधित है। प्रचलित कथा के मुताबिक, राजा अपनी रानी के साथ नदी किनारे भ्रमण कर रहे थे। इसी दौरान उन्हें नदी में एक काला पत्थर दिखाई दिया, जिस पर नाग फन फैलाकर बैठा हुआ था।
राजा मोरध्वज ने पत्थर को नदी से निकलवाया। मान्यता है कि उसी समय आकाशवाणी हुई और उन्हें प्रतिमा को कंधे पर उठाकर ले जाने का निर्देश मिला। राजा प्रतिमा लेकर आगे बढ़े, लेकिन रास्ते में थकान के कारण उन्होंने उसे जमीन पर रख दिया। इसके बाद अनेक प्रयासों के बावजूद प्रतिमा को दोबारा उठाया नहीं जा सका। अंततः उसी स्थान पर देवी की स्थापना की गई, जो वर्तमान में महामाया देवी मंदिर के रूप में प्रसिद्ध है।
इसी प्रकार कुशालपुर चौक स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर लगभग 200 साल पुराना बताया जाता है। इस मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यहां की पूजा व्यवस्था है। सामान्यतः देवी मंदिरों में ब्राह्मण पुजारियों द्वारा पूजा-अर्चना की जाती है, लेकिन इस मंदिर में यादव समाज के परिवार पीढ़ियों से पूजा का दायित्व निभाते आ रहे हैं।
मंदिर की स्थापना से जुड़ी स्थानीय मान्यता के अनुसार, पहले यह क्षेत्र घने जंगलों से घिरा हुआ था और यादव समाज के लोग यहां मवेशी चराने आते थे। एक दिन ग्वालिन गणेशिया बाई ने एक गाय को पत्थर पर खड़े देखा, जिसके थन से स्वतः दूध निकलकर पत्थर पर गिर रहा था। उन्होंने इसकी जानकारी ग्रामीणों को दी। बाद में उस पत्थर को देवी की प्रतिमा के रूप में पहचाना गया और उसी स्थान पर छोटा मंदिर बनाकर प्राण प्रतिष्ठा की गई। इसके बाद से यादव परिवार ही मंदिर की पूजा परंपरा का निर्वहन करता आ रहा है।
पुरानी बस्ती से लगे ब्राह्मणपारा का कंकाली मठ भी ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय विवरणों के अनुसार, लगभग 600 साल पहले नागा साधुओं ने इसकी स्थापना की थी। बताया जाता है कि उस समय यह क्षेत्र श्मशान घाट के रूप में उपयोग होता था। कंकालों के बीच देवी प्रतिमा स्थापित होने के कारण इस स्थान का नाम कंकाली पड़ा। कालांतर में देवी प्रतिमा को मठ से कुछ दूरी पर निर्मित मंदिर में स्थापित कर दिया गया।
कंकाली मठ की सबसे अलग विशेषता इसके पट खुलने की परंपरा है। मठ वर्षभर बंद रहता है और केवल दशहरे के अवसर पर इसके पट खोले जाते हैं। इस दौरान विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। मठ के भीतर प्राचीन अस्त्र-शस्त्र भी सुरक्षित रखे होने की जानकारी है, जिन्हें नागा साधुओं के काल का बताया जाता है। मंदिर के सामने स्थित तालाब का भी धार्मिक महत्व है। दशहरे के अवसर पर श्रद्धालु अपने घरों में बोए गए जंवारा और ज्योत का यहां विसर्जन करते हैं।
वहीं, पुरानी बस्ती के अमीनपारा थाना के समीप स्थित शीतला माता मंदिर की प्राचीनता लगभग 250 साल बताई जाती है। इस मंदिर में देवी की पारंपरिक प्रतिमा के स्थान पर पत्थर के पिंड की पूजा की जाती है। स्थानीय धार्मिक मान्यता है कि यह पिंड भूमि से स्वयं प्रकट हुआ था और तभी से इसी स्वरूप में माता की आराधना की जा रही है।
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