पटना , सितंबर 20 -- बिहार में जीविका से जुड़ी महिलाएं अब घर संभालने के साथ-साथ घर बनाने और निर्माण कार्यों में भी अपनी दक्षता साबित कर रही हैं।समाज में ईंट जोड़कर मकान बनाना, कंक्रीट मिलाना और प्लास्टर करना हमेशा से पुरुषों का काम माना जाता रहा है। इस तरह के विनिर्माण के क्षेत्र पुरुष एकाधिकार और वर्चस्व वाले क्षेत्र माने जाते रहे हैं, लेकिन बिहार में महिला सशक्तिकरण ने इस क्षेत्र में भी नई इबारत लिखनी शुरू कर दी है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के कार्यकाल में दीदीयों के सशक्तिकरण को अधिक तरजीह देते हुए उन्हें स्वालंबी बनाने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं।

हाल के दिनों में जीविका समूहों से जुड़ी दर्जनों महिलाओं ने जब अपने हाथ में करनी और साहुल (मिस्त्री के औजार) थामा तो समाज में बदलाव की एक नई शुरुआत हुई। आज राज्य की करीब 250 से भी अधिक जीविका दीदियां टायलेट क्लिनिक के रूप में निर्माण और प्लंबिंग के कार्यों से न सिर्फ अपने हुनर का लोहा मनवा रही हैं, बल्कि वह पड़ोसी राज्यों के लिए भी प्रेरक बन चुकी हैं।

यूनिसेफ के सहयोग से ग्रामीण विकास विभाग की ओर से वर्ष 2024 में टायलेट क्लिनिक मुहिम की शुरुआत मुजफ्फरपुर से की गई थी जो आज वृहद रूप ले चुकी है। निर्माण और प्लंबिंग के कार्यों में दक्ष जीविका दीदियां विशेष प्रशिक्षण के बदौलत शौचालय शीट में पी-ट्रैप, जल निकासी का पाइप, पाइपों का सही ढलान, फ्लश वाल्व, कनेक्शन, सुलैशन का सही प्रयोग, शीट के नीचे और पी-ट्रैप गैप का नव निर्माण और मरम्तीकरण, वेंटीलेशन आदि कार्यों को बखूबी निभा रही हैं। साथ ही वह पड़ोसी बंगाल, झारखंड आदि राज्यों में भी महिलाओं को प्रशिक्षित करने का कार्य कर रही हैं।

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