नयी दिल्ली , अक्टूबर 22 -- उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने राज्यों से सुशासन और जीवनयापन में सुगमता को बढ़ावा देने के लिए पुराने और अप्रासंगिक कानूनों की पहचान कर उन्हें संशोधित करने या निरस्त करने का आग्रह किया है।

श्री राधाकृष्णन ने गुरुवार को यहाँ भारतीय विधि आयोग की ओर से आयोजित 'सहकारी संघवाद और विधिक सुधार : राष्ट्रीय एवं राज्य परिप्रेक्ष्य' विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता में एकता है। संविधान केंद्र की शक्तियों, राज्यों की जिम्मेदारियों और उनकी वैध स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने की रूपरेखा प्रदान करता है। भारतीय संघवाद की वास्तविक शक्ति विविधताओं का सम्मान करते हुए साझा राष्ट्रीय उद्देश्यों की दिशा में मिलकर काम करने में निहित है।

उन्होंने सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 'टीम इंडिया' की परिकल्पना केंद्र और राज्यों के बीच परामर्श, समन्वय तथा साझा जिम्मेदारी पर आधारित है। उन्होंने कहा कि व्यापक जनहित के कार्यों में राजनीतिक मतभेद बाधा नहीं बनने चाहिए। उपराष्ट्रपति ने विकसित भारत-2047 के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विधिक सुधारों को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि विकास के लिए मजबूत कानून, पारदर्शी संस्थाएं, कुशल प्रशासन और सभी नागरिकों को न्याय मिलना आवश्यक है।

उन्होंने पिछले 12 वर्षों में औपनिवेशिक काल के तीन आपराधिक कानूनों को बदलने और 1,700 से अधिक अप्रचलित कानूनों को निरस्त किए जाने को भारतीय विधिक व्यवस्था के आधुनिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने राज्य विधि आयोगों से पुराने और अप्रासंगिक कानूनों की व्यवस्थित समीक्षा करने तथा आवश्यकतानुसार उनमें संशोधन या उन्हें निरस्त करने की सिफारिश करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इससे प्रशासन अधिक प्रभावी होगा और नागरिकों तथा कारोबारियों के लिए अनावश्यक कानूनी बाधाएं कम करने में मदद मिलेगी।

उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि विधिक सुधारों में सहकारी संघवाद का अर्थ हर मामले में एकरूपता स्थापित करना नहीं है। केंद्र और राज्यों की संवैधानिक जिम्मेदारियां जहां एक-दूसरे से जुड़ती हैं, वहां दोनों को समन्वय के साथ काम करना चाहिए। साथ ही, राज्यों की उन वैध स्वतंत्रताओं का संरक्षण भी जरूरी है, जिनके माध्यम से वे अपनी विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप निर्णय ले सकते हैं। उन्होंने भारतीय विधि आयोग, राज्य विधि आयोगों और राज्य विधि विभागों के बीच बेहतर तालमेल के लिए अंतरराज्यीय परामर्श, सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों के आदान-प्रदान और पुराने कानूनों की नियमित समीक्षा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सशक्त राज्य ही सशक्त संघ का निर्माण करते हैं और सहकारी शासन संवैधानिक आदर्शों को जनकल्याण में बदलता है।

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