देवरिया , अक्टूबर 21 -- पूर्वांचल की महत्वपूर्ण सीटों में शुमार देवरिया सदर विधानसभा का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है।1952 से 1967 तक यह सीट देवरिया उत्तर के नाम से जानी जाती थी। 1967 में परिसीमन के बाद इसका नाम केवल देवरिया कर दिया गया। शुरुआती दो दशक तक इस सीट पर कांग्रेस का एकछत्र राज था। मोहम्मद फारूक चिश्ती ने 1952 से 1967 तक लगातार चार बार कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज कर इसे कांग्रेस का अभेद्य गढ़ बना दिया था।

70 और 80 के दशक में यहां समाजवादियों और जनता परिवार का दौर आया। कृष्ण राय, रुद्र प्रताप सिंह, फजले मसूद जैसे नेताओं ने अलग-अलग दलों से जीत हासिल की। 90 के दशक के बाद भाजपा ने यहां अपनी जड़ें मजबूत करनी शुरू कीं और रवींद्र प्रताप मल्ल ने 1991 और 1993 में लगातार दो बार कमल खिलाया। पिछले कुछ सालों में यह सीट पूरी तरह भाजपा का किला बन चुकी है। 2007 में सपा के दीनानाथ कुशवाहा ने जरूर सेंध लगाई, लेकिन 2012 से लगातार भाजपा जीत रही है।

इस सीट पर 1952 से 1967 तक कांग्रेस के मोहम्मद फारूख चिश्ती ने लगातार चार बार विधायक रहे। 1969 में दीप नारायण मणि (निर्दलीय),1974 में कृष्ण राय (भारतीय क्रांति दल),1977 में कृष्ण राय (जनता पार्टी),1980 में रुद्र प्रताप सिंह (जनता पार्टी सेक्युलर),1985 - फजले मसूद (कांग्रेस), 1989 में राम छबिला मिश्रा (जनता दल),1991 मे़ रवींद्र प्रताप मल्ल (भाजपा), 1993 में रवींद्र प्रताप मल्ल (भाजपा),1996 में सुभाष चंद्र श्रीवास्तव (जनता दल), 2002 में दीनानाथ कुशवाहा (नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी), 2007 - दीनानाथ कुशवाहा (सपा), 2012 में जन्मेजय सिंह (भाजपा), 2017 में जन्मेजय सिंह (भाजपा),2020 (उपचुनाव) में डॉ. सत्य प्रकाश मणि त्रिपाठी (भाजपा) और 2022 में शलभ मणि त्रिपाठी (भाजपा) यहां से विधायक रहे हैं।

इस सीट पर अगर जातिगत समीकरणों की बात की जाय तो यहां सवर्ण, गैर-यादव ओबीसी और दलित वर्ग की बड़ी भूमिका है। यहाँ लगभग 25 प्रतिशत गैर-यादव ओबीसी, 25 प्रतिशत सामान्य (सवर्ण व व्यापारी वर्ग), 15 प्रतिशत दलित, 10 प्रतिशत यादव, 7 प्रतिशत मुस्लिम, 7 प्रतिशत राजभर और शेष अन्य जातियां हैं। देवरिया सदर सीट पर लगभग 50 प्रतिशत मतदाता शहरी क्षेत्र में आते हैं, जिसमें सवर्ण और व्यापारी वर्ग का प्रभाव काफी मजबूत माना जाता है।

यहां विकास की तस्वीर में जिले में सड़क नेटवर्क को मजबूत किया गया है। देवरिया-कसया-हाटा फोरलेन मार्ग, बैतालपुर-बलटिकरा मार्ग और गोरखपुर-देवरिया मार्ग सहित करीब 380 से अधिक सड़कों का चौड़ीकरण, सुदृढ़ीकरण और सौंदर्यीकरण किया गया है।जिससे आवागमन सुगम हुआ है। महर्षि देवरहा बाबा मेडिकल कॉलेज की स्थापना जिले के लिए मील का पत्थर साबित हुई है। इससे पहले गंभीर बीमारियों के लिए लोगों को गोरखपुर या लखनऊ जाना पड़ता था।अब जिला स्तर पर ही बेहतर चिकित्सा सुविधा मिलने लगी है। विद्युत उप-केंद्रों की स्थापना से ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति के घंटों में सुधार हुआ है। वहीं देवरिया नगर पालिका क्षेत्र में स्ट्रीट लाइट, नाली-जल निकासी और इंटरलॉकिंग सड़कों के काम में तेजी आई है।

इन सबके बावजूद चुनौतियां यहां अब भी बरकरार है। देवरिया और बैतालपुर की बंद पड़ी चीनी मिलों को पुनः शुरू करना यहां का सबसे बड़ा और दशकों पुराना मुद्दा है। मिलें बंद होने से किसानों ने गन्ने की खेती छोड़ दी, जिससे कृषि अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। जिले में कोई बड़ा उद्योग न होने से युवाओं के लिए रोजगार के अवसर नगण्य हैं। यही कारण है कि बड़ी संख्या में युवा रोजी-रोटी के लिए मुंबई, दिल्ली और गुजरात पलायन करने को मजबूर हैं। तमाम दावों के बावजूद मानसून में देवरिया शहर के कई मोहल्लों और ग्रामीण इलाकों में जलभराव की समस्या आज भी गंभीर बनी हुई है।

यहां स्थानीय छात्र और किसान लंबे समय से बीआरडी पीजी कॉलेज को पूर्ण कृषि विश्वविद्यालय के रूप में अपग्रेड करने की मांग कर रहे हैं।जो अब तक पूरी नहीं हुई है।कुल मिलाकर देवरिया विकास की राह पर है, पर चीनी मिल और रोजगार जैसे मुद्दों के समाधान के बिना यह विकास अधूरा माना जाएगा।

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