श्रीनगर, मार्च 19 -- उत्तराखंड के श्रीनगर में "नशा मुक्त देवभूमि" अभियान के तहत राजकीय पॉलिटेक्निक में गुरुवार को पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम द्वारा नशीले पदार्थ की मौजूदगी जाँचने के लिए नमूने लेना (ड्रग सैंपलिंग) एवं जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान 79 छात्र-छात्राओं की सहमति से अनुशासित जांच प्रक्रिया (रैंडम ड्रग सैंपलिंग) की गई।
पुलिस टीम के नेतृत्व में आयोजित इस अभियान में स्वास्थ्य विभाग की विशेषज्ञ टीम ने पूरी गोपनीयता और वैज्ञानिक तरीके से जांच प्रक्रिया को अंजाम दिया। इस पहल का उद्देश्य केवल जांच तक सीमित न होकर युवाओं को नशे के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करना और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित करना रहा।
कार्यक्रम में मनोचिकित्सक डॉ. आशीष गुसाईं ने छात्रों को संबोधित करते हुए बताया कि नशे की शुरुआत अक्सर जिज्ञासा, साथियों के दबाव या मानसिक तनाव के कारण होती है, जो आगे चलकर गंभीर लत का रूप ले लेती है। उन्होंने कहा कि नशा मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करता है और निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर बनाता है। इसके शुरुआती संकेतों में पढ़ाई में रुचि कम होना, व्यवहार में बदलाव और आत्मविश्वास में गिरावट शामिल हैं।
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