रांची , अक्टूबर 12 -- झारखंड की राजधानी रांची में दुर्गापूजा की परंपरा करीब 143 साल पुरानी है।

वर्ष 1883 में शहर के दुर्गाबाड़ी में पहली बार सार्वजनिक दुर्गापूजा का आयोजन किया गया था। उस समय पूजा पर महज एक रुपया 56 पैसे खर्च हुए थे और बंगाली समुदाय के करीब 200 लोग इसमें शामिल हुए थे। आज यही दुर्गाबाड़ी रांची की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है।

अल्बर्ट एक्का चौक के समीप स्थित इस मंडप में आज भी मां दुर्गा की पूजा बांग्ला पद्धति और पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार की जाती है।

रांची में दुर्गापूजा की शुरुआत का श्रेय जिला स्कूल के शिक्षक गंगाचरण वेदांत बागीश को जाता है। उस समय रांची एक छोटा-सा कस्बा था और दक्षिण छोटानागपुर क्षेत्र का जिला मुख्यालय लोहरदगा हुआ करता था। शहर का विस्तार मुख्य रूप से अपर बाजार और जिला स्कूल के आसपास तक सीमित था। यहां कुछ पक्के मकानों के अलावा खपरैल और झोपड़ीनुमा घर ही नजर आते थे।

इसी दौर में गंगाचरण वेदांत बागीश ने बंगाली समाज के प्रबुद्ध लोगों के सामने कोलकाता की तर्ज पर रांची में भी सार्वजनिक दुर्गापूजा शुरू करने का प्रस्ताव रखा। उनके प्रयास से वर्ष 1883 में दुर्गापूजा समिति का गठन किया गया। समिति के पहले अध्यक्ष देवेंद्र लाल बासु और सचिव नवाकृष्ण राय बने। देवेंद्र लाल बासु ने समिति के संचालन के लिए 51 रुपये का दान भी दिया था। फिरायालाल चौक के समीप स्थित एक खपरैल के मकान में पूजा की शुरुआत हुई, जिसे बाद में दुर्गाबाड़ी के रूप में पहचान मिली।

दुर्गाबाड़ी की खासियत है कि यहां पूजा की विधि-विधान से लेकर प्रतिमा निर्माण और पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाने तक की जिम्मेदारियां पीढ़ियों से निभाई जा रही हैं। शुरुआत में मूर्ति निर्माण का काम पश्चिम बंगाल के झालदा के कारीगर जगन्नाथ लहरी ने किया। बाद में बीरभूम जिले के पुरवा गांव के देवेंद्र नाथ सूत्रधार और उनके वंशज अन्नदा सूत्रधार तथा तरुण सूत्रधार इस परंपरा से जुड़े रहे। शुरुआती दौर में मां दुर्गा की प्रतिमा करीब पांच फुट ऊंची बनाई गई थी। प्रतिमा निर्माण के लिए बंगाल के शोभाबाजार-सोनागाछी से मिट्टी लाने की परंपरा का भी उल्लेख मिलता है।

यहां ढाक बजाने वाले कलाकार भी पश्चिम बंगाल से आते हैं। खास बात यह है कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही परिवार के सदस्य ढाक और ढोलक बजाने की परंपरा निभाते आ रहे हैं।

दुर्गाबाड़ी में पूजा की शुरुआत अन्य कई पूजा मंडपों से अलग होती है। यहां नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना नहीं की जाती, बल्कि षष्ठी के दिन छह कलश स्थापित किए जाते हैं। इसके बाद पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठान शुरू होते हैं। विजयादशमी के दिन महिलाओं के बीच होने वाला सिंदूर खेला भी यहां का प्रमुख आकर्षण है।

मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन की परंपरा भी विशेष है। बंगाल की रीति के अनुसार श्रद्धालु प्रतिमा को अपने कंधों पर उठाकर विसर्जन घाट तक ले जाते हैं। बदलते समय के बावजूद दुर्गाबाड़ी में पूजा का पारंपरिक स्वरूप कायम है। वर्ष 1883 में एक छोटे से खपरैल के मकान से शुरू हुई यह परंपरा आज रांची में बंगाली संस्कृति, आस्था और ऐतिहासिक विरासत की पहचान बन चुकी है।

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