सहारनपुर , सितंबर 03 -- उत्तर प्रदेश की सत्ता से करीब दो दशक से दूर समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव अब अपनी रणनीति को लेकर सधे कदमों के साथ आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अंतिम छोर पर स्थित सहारनपुर में बुधवार को उनका दौरा इसी लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अखिलेश ने यहां पार्टी के विभिन्न खेमों के नेताओं और प्रभावशाली चेहरों से अलग-अलग मुलाकात कर फीडबैक लिया और उनके हितों का ध्यान रखने तथा सम्मान देने का भरोसा दिलाया।
सहारनपुर ही नहीं, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा के लिए चुनावी सफलता हासिल करना मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता और मजबूत जनाधार के कारण चुनौतीपूर्ण है, लेकिन इसे असंभव नहीं माना जा सकता। अखिलेश ने संकेत दिया कि पार्टी चुनाव जीतने की क्षमता रखने वाले नेताओं को ही उम्मीदवार बनाएगी।
राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) से दूरी बढ़ने के बाद सपा के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन का महत्व बढ़ गया है। हालांकि, सहारनपुर में कांग्रेस के साथ गठबंधन के बावजूद मौजूदा सांसद इमरान मसूद की राजनीतिक पकड़ सपा के लिए चुनौती बनी हुई है। माना जा रहा है कि अखिलेश ने इसी चुनौती से निपटने के लिए स्थानीय स्तर पर अपने प्रभावी चेहरों को सक्रिय करने की रणनीति पर जोर दिया है।
सपा के पास दो युवा मुस्लिम विधायक आशु मलिक और उमर अली के अलावा अनुभवी पूर्व सांसद हाजी फजलुर्रहमान कुरैशी तथा कैराना की सांसद इकरा हसन जैसे चेहरे हैं। अखिलेश ने चौधरी यशपाल सिंह के दोनों पुत्रों चौधरी रूद्रसेन और चौधरी इंद्रसेन को भी पर्याप्त तवज्जो दी। उन्होंने इस परिवार से एमएलसी बनाए जाने की बात कही।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गुर्जर मतदाताओं का एक वर्ग भाजपा और रालोद के प्रभाव में माना जाता है। ऐसे में सपा गुर्जर समाज के बीच अपना आधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। वहीं, मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन को सपा-कांग्रेस गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। दलित समाज के स्थानीय नेताओं विनोद तेजियान और ममता चौधरी जैसे चेहरों को भी सपा अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।
चुनावी रणनीति में सपा-कांग्रेस गठबंधन द्वारा आजाद समाज पार्टी को दूरी पर रखने की संभावना भी महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, सपा और कांग्रेस के बीच सीटों के संभावित बंटवारे को लेकर भी सहारनपुर पर विशेष नजर रहेगी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सपा नगर और आरक्षित रामपुर मनिहारान सीट कांग्रेस के लिए छोड़ सकती है, जबकि बेहट और सहारनपुर ग्रामीण सीटों पर सपा का अपना आधार है।
गंगोह और नकुड़ विधानसभा क्षेत्र कैराना लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा हैं, जिसका प्रतिनिधित्व इकरा हसन करती हैं। ऐसे में देवबंद विधानसभा सीट पर सपा की अपनी दावेदारी महत्वपूर्ण होगी। पार्टी यहां राजपूत उम्मीदवार उतारने पर भी विचार कर सकती है।
अखिलेश ने सहारनपुर को विशेष महत्व देते हुए जिले के लिए अलग से घोषणापत्र जारी करने की बात भी कही है। इससे संकेत मिलता है कि सपा आगामी विधानसभा चुनाव में सहारनपुर को अपनी रणनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र मान रही है।
रणनीतिक लिहाज से अखिलेश यादव प्रोफेसर सुधीर कुमार पंवार को भी महत्व दे रहे हैं। पार्टी के पास जाट चेहरे के रूप में हरेंद्र मलिक पहले से मौजूद हैं, जो केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान को पराजित कर सांसद बने हैं। रालोद से दूरी के बाद सपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए संभावित नुकसान की भरपाई के लिए जाट, गुर्जर, मुस्लिम और दलित समीकरण को साधने की कोशिश करती दिखाई दे रही है।
कुल मिलाकर, अखिलेश यादव का सहारनपुर दौरा केवल संगठनात्मक मुलाकातों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण साधने के संकेत भी दिखाई दिए। दौरे के दौरान अखिलेश आत्मविश्वास से लबरेज और सत्ता में वापसी के लिए गंभीर प्रयास करते नजर आए।
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