पुड्डुचेरी , मार्च 22 -- पुड्डुचेरी मानिला मक्कल मुनेत्र कझगम (पीएमएमएमके) के संस्थापक-अध्यक्ष प्रो. एम. रामदास ने रविवार को दावा किया कि केंद्र शासित प्रदेश में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) से जुड़े हालिया घटनाक्रमों ने सत्ताधारी अखिल भारतीय एन आर कांग्रेस (एआईएनआरसी) के संस्थापक एवं मुख्यमंत्री एन. रंगासामी के नेतृत्व की निरंतरता और विश्वसनीयता को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।

प्रो. रामदास ने रविवार को कहा कि यह सार्वजनिक रिकॉर्ड में दर्ज है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ चुनावी तालमेल करने से पहले उन्होंने दो विशिष्ट और महत्वपूर्ण शर्तें रखी थीं जिसमें पहली, नवगठित लाचिया जननायक काची (एलजेके) को राजग गठबंधन में शामिल नहीं करना और दूसरी, पुड्डुचेरी को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की लंबे समय से लंबित और भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण मांग को पूरा करना शामिल थी।

लोगों ने इन शर्तों की सराहना की। चूंकि भाजपा की ओर से इन मांगों पर कोई जवाब नहीं आया है और श्री रंगासामी तमिलनाडु के मदुरै और तिरुचेंदूर की तीर्थ यात्रा पर जाने से राजनीतिक जानकारों को लगा कि राजग टूटने की कगार पर है, लेकिन ये दोनों शर्तें दो दिनों के भीतर ही बहुत चुपचाप तरीके से वापस ले ली गयीं। उन्होंने कहा कि सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात यह थी कि अचानक, बिना लोगों को कोई सफ़ाई दिए, महज़ दो दिनों के भीतर ही कैसे शर्तों को वापस ले लिया गया।

श्री रामदास ने कहा कि इस तरह अचानक अपना रुख़ बदल लेने से यह धारणा बनी है कि सार्वजनिक रूप से लिए गए फ़ैसलों के पीछे कोई पक्का इरादा नहीं होता, बल्कि वे दबाव या अपनी सुविधा के हिसाब से बदल दिए जाते हैं।

उन्होंने कहा, "इससे एक बुनियादी सवाल खड़ा होता है। अगर एक मुख्यमंत्री अपनी ही घोषित शर्तों पर कायम नहीं रह सकता, तो लोगों को यह भरोसा कैसे होगा कि बड़े मामलों में उनके हितों की रक्षा की जाएगी?" उन्होंने कहा कि यह याद रखना ज़रूरी है कि राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग एनआर कांग्रेस के लिए कोई मामूली मुद्दा नहीं था। असल में, यह पार्टी बनाने के मुख्य कारणों में से एक था। पुड्डुचेरी के लोगों को यह भरोसा दिलाया गया था कि इस मांग को पूरी दृढ़ता और स्पष्टता के साथ उठाया जाएगा, लेकिन, मौजूदा घटनाक्रम से पता चलता है कि इस तरह की एक अहम मांग को, एक अहम राजनीतिक मौके पर, केंद्र सरकार से कोई वादा या भरोसा लिए बिना ही, एक तरफ़ रखा जा सकता है। इससे एक दुखद लेकिन अटल नतीजा निकलता है कि राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग, जिसमें लोगों की उम्मीदें जुड़ी हैं, एक गंभीर लक्ष्य होने के बजाय महज़ एक राजनीतिक नारा बनकर रह गयी है। अगर गठबंधन बनाते समय भी जब राजनीतिक ताक़त अपने चरम पर होती है, इस मांग को ज़ोरदार ढंग से नहीं उठाया जाता, तो यह समझना मुश्किल है कि इसे कब और कैसे सही मायनों में पूरा किया जाएगा।

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