संयुक्त राष्ट्र , मार्च 22 -- संयुक्त राष्ट्र में 'महिलाओं की स्थिति पर आयोग' (सीएसडब्लू) का हालिया सत्र महिलाओं के अधिकारों और न्याय तक पहुंच जैसे गंभीर विषयों पर गहरे कूटनीतिक विभाजन का गवाह बना।
दशकों से चली आ रही 'आम सहमति' की परंपरा तब टूट गयी, जब 'जेंडर' की परिभाषा और यौन व प्रजनन स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सदस्य देशों के बीच तीखा गतिरोध पैदा हो गया। अमेरिका के पेश किये गये संशोधनों और उस पर बेल्जियम के लाये गये 'नो एक्शन मोशन' ने माहौल को तल्खियों से भर दिया। इसके परिणामस्वरूप मुख्य निष्कर्षों को सर्वसम्मति के बजाय मतदान के जरिये अपनाना पड़ा। इस ऐतिहासिक खींचतान के बीच, भारत सहित छह देशों ने मतदान से दूरी बनाए रखी, जो वैश्विक मंच पर सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों और बहुपक्षवाद के भविष्य पर उठते बड़े सवालों की ओर इशारा करता है।
संयुक्त राष्ट्र में 'महिलाओं की स्थिति पर आयोग' (सीएसडब्लू) के हाल ही में आयोजित 70वां सत्र मुख्य रूप से 'जेंडर' की परिभाषा, यौन और प्रजनन स्वास्थ्य और संप्रभुता जैसे विषयों पर सदस्य देशों के बीच गहरे मतभेद सामने आये।
सत्र की शुरुआत में ही एक अभूतपूर्व घटना घटी। इस वर्ष का मुख्य विषय 'सभी महिलाओं और लड़कियों के लिए न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करना और उसे मजबूत करना' था। आमतौर पर आयोग के निष्कर्ष सर्वसम्मति से स्वीकार किए जाते हैं, लेकिन पेश किये गये संशोधनों को इस बार अमेरिका के खारिज करने के बाद, निष्कर्षों को मतदान के जरिये अपनाना पड़ा। इसमें 37 देशों ने पक्ष में मतदान किया, जबकि अमेरिका ने विरोध में और भारत समेत छह देशों ने मतदान नहीं किया।
सत्र के दौरान 'न्याय तक पहुंच' से जुड़े मुख्य निष्कर्षों पर भारत का पारंपरिक और सुस्पष्ट रुख यह रहा है कि महिलाओं के अधिकारों जैसे संवेदनशील वैश्विक विषयों पर निर्णय 'मतदान' के बजाय 'आम सहमति' के आधार पर लिए जाने चाहिए, क्योंकि मतदान सदस्य देशों के बीच विभाजन पैदा करता है।
भारत ने किसी एक गुट का पक्ष लेने के बजाय संतुलित मध्य मार्ग अपनाया, जहां उसने महिलाओं के उत्थान के मूल उद्देश्यों का तो समर्थन किया, लेकिन 'जेंडर' और 'प्रजनन स्वास्थ्य' जैसी शब्दावलियों पर थोपी जाने वाली परिभाषाओं और प्रक्रियात्मक मतभेदों के कारण खुद को मतदान से दूर रखा।
सत्र के दौरान सबसे बड़ा विवाद अमेरिका के पेश किये गये प्रस्ताव को लेकर हुआ। इसमें 'जेंडर' शब्द की सीमित और रूढ़िवादी व्याख्या करने की कोशिश की गयी थी।
बेल्जियम ने यूरोपीय संघ की ओर से इस पर 'नो एक्शन मोशन' पेश किया। इसका अर्थ था कि इस प्रस्ताव पर कोई चर्चा ही न की जाये। बेल्जियम का तर्क था कि यह प्रस्ताव 30 साल पहले बीजिंग घोषणापत्र में तय की गयी परिभाषाओं को बदलने और वैश्विक प्रगति को पीछे ले जाने की कोशिश है। अंततः 23 मतों के साथ इस मोशन को मंजूरी मिली और अमेरिकी प्रस्ताव को बिना चर्चा के खारिज कर दिया गया।
सत्र के अंतिम दिन पाकिस्तान, नाइजीरिया और सेनेगल जैसे देशों ने मतदान के जरिये निर्णय लेने की प्रक्रिया पर चिंता जताई। इन देशों का मानना था कि मतदान से निष्कर्ष निकालना बहुपक्षवाद के सिद्धांतों के खिलाफ है। पाकिस्तान ने स्पष्ट किया कि हालांकि प्रस्ताव का वह समर्थन करता है, लेकिन यह सभी देशों की साझा सहमति को नहीं दर्शाता। वहीं, वेटिकन ने 'जेंडर' और 'प्रजनन अधिकार' जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर अपनी पुरानी आपत्तियों को दोहराया।
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