ब्यावर , अप्रैल 04 -- आध्यात्मिक गुरु एवं 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी ने महाभारत को लेकर लोगों में व्याप्त कुछ भ्रांतियों को दूर करते हुए कहा है कि युवाओं को महाभारत पढ़ना एवं सुनना चाहिए और कृष्ण नीति कुटिलों के साथ कुटिल एवं सज्जनों के साथ सज्जनता का व्यवहार आज हमारे जीवन में लाना चाहिए।

राजस्थान के ब्यावर में श्रीसीमेंट द्वारा आयोजित 'कृष्ण नीति दर्शन कथा' कर रहे स्वामी गिरी ने शुक्रवार को पत्रकारों के साथ बातचीत में यह बात कही। उन्होंने एक प्रश्न के जवाब में कहा कि घरों में महाभारत का चित्र लगाना सही नहीं होना यह देश की संस्कृति को हटाने के लिए विदेशी विचारों से आयात एक गलत धारणा बन गई हैं और लोग मान्यता कर बैठे कि महाभारत का ग्रंथ भी घर में नहीं रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि जो महाभारत का ग्रंथ अपने घर में रखेगा वह विजयी होकर आयेगा। महाभारत विजय का प्रतीक गंथ है और उसके घर में रखने से विजेता ही विजेता होगी। इसलिए महाभारत को पढ़ना और घर में उसका चित्र रखना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जो महाभारत का चिंतन करेगा उसका किसी के साथ् कलह नहीं होगा यह महाभात का मूल मंत्र हैं। उन्होंने कहा कि वह पिछले 26 वर्षों से महाभारत के ही प्रचार में लगे हुए हैं। भागवत गीता महाभारत का ही अंश हैं और महाभारत घर में हाेना चाहिए और पढ़ना एवं सुनना चाहिए। युवकों को तो महाभारत ही सुनना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन के शुरु में 20-21 साल तक राम कथा से नीति सीखना, उसके बाद महाभारत से जीतने की युक्ति सीखना और 50-60 साल के बाद भागवत सीखकर भक्ति प्राप्त करना यह जीवन एवं अध्ययन का क्रम हैं।

स्वामी गिरी महाराज ने कहा कि शिवाजी बचपन से महाभारत के श्रोता थे और उन्होंने कृष्ण नीति को अपनाते हुए देश की रणनीति में नया आयाम जोड़ दिया था। शिवाजी ने माना कि हमेशा जीतने के लिए लड़ना चाहिए चाहे उसे भागना ही क्यों ना पड़े। औंरगजेब महाराष्ट में आया मगर वह 25 वर्षों तक लड़ता रहा लेकिन आखिर में उसके पास महाराष्ट का केवल एक किला था। यह महाराष्ट्र में कृष्ण नीति को अपनाते हुए उससे लड़ते रहने का ही परिणाम था। उन्होंने कहा कि कृष्ण भगवान से बड़ा कोई आदर्श नहीं हैं।

एक अन्य प्रश्न के जवाब में उन्हाने ग्रहस्थ आश्रम को श्रेष्ठ बताते हुए कहा कि गृहस्थ आश्रम बहुत बड़ी जिम्मेदारी एवं दायित्व है। हीनभावना नही होनी चाहिए क्योंकि श्रीकृष्ण एवं श्री राम गहस्थ थे। इसलिए गृहस्थ आश्रम सर्वोपरि है। जीवन पवित्र होना चाहिए और अपनी कमाई का कुछ अंश समाज एवं धर्म के लिए व्यय करते ही रहना चाहिए तथा प्रात: एवं सायं काल में दो मिनट भगवन का स्मरण भी करना चाहिए।

कृष्ण नीति की सार्थकता के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण ने अपने लिए कुछ नहीं करते हुए सेवक के रुप में दौडतेे रहे कि अधिक से अधिक लोगों का हित हो। भगवान कृष्ण ने जब गलत नीति से पांडवों को कुचले का प्रयास होने लगा तो अपनी नीति को बदला। कुटिलों के साथ कुटिल नीति होनी चाहिए और सज्जनो के साथ सज्जनता का व्यवहार होना चाहिए और आज भी हमारे जीवन में यह लाना चाहिए।

सीएसआर से जुड़े सवाल पर स्वामी गिरी ने अभावग्रस्त लोगों की सबसे अधिक सेवा करने की जरुरत बताते हुए कहा कि पैसे को बांटिए मत, इससे लोगों में गलत आदते पैदा होती है। अभावग्रस्त एवं निर्धन लोगों के बच्चों को शिक्षा देनी चाहिए ताकि गरीब से गरीब बालक पढ़ाई से वंचित नहीं रहे। सीएसआर के फंड को गांवो की और उससे भी आगे वनों की ओर ले जाना चाहिए जहां बालकों को कैसे पढ़ाये और उन्हें कैसे मुख्यधारा में लाया जाये, इस पर बल दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि हम लोगों को सीएसआर कामों में ऐसे काम में खर्च करना चाहिए जिसमें गांवों को बचाना चाहिए। शहर में युवकों में बढ़ते नशे की प्रवृति को कैसे रोका एवं इससे बचाने के लिए जो संस्था एवं लोग काम कर रहे हैं उन्हें बढावा देना चाहिए।

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