बेंगलुरु , मार्च 10 -- दुनिया आज जब जलवायु परिवर्तन, एआई से पैदा होने वाली उथल-पुथल और ईरान-इज़रायल के बीच बढ़ते संघर्ष जैसे बड़े संकटों से जूझ रही है, तब इंसान के जीवन के असली मकसद का सवाल और भी प्रासंगिक हो गया है।

जाने माने लेखक कृष्णेंदु शेखर दासपटनायक की किताब 'द सिग्निफिकेंस ऑफ श्री अरबिंदो आश्रम इन द इवोल्यूशन ऑफ ह्यूमैनिटी' अनिश्चितता के इस दौर में एक मार्गदर्शक के रूप में सामने आई है। पुडुचेरी में आश्रम के 100 साल पूरे होने के मौके पर प्रकाशित 564 पन्नों की यह किताब न केवल इस संस्थान का इतिहास बताती है, बल्कि आज की दुनिया में इसकी जरूरत पर भी जोर देती है।

इस पुस्तक के लेखक पिछले तीन दशकों से आश्रम के समर्पित सदस्य रहे हैं और उनकी बातों में गहराई और अनुभव झलकता है। यह किताब 1926 में आश्रम की स्थापना से लेकर, श्री अरबिंदो की साधना और 'मां' के मार्गदर्शन में इसके मौजूदा स्वरूप तक के सफर को दर्शाती है।

श्री अरबिंदो और 'मां' के लेखों का हवाला देते हुए लेखक बताते हैं कि यह आश्रम दुनिया से भागने की जगह नहीं, बल्कि एक ऐसी प्रयोगशाला है जहां इंसान की चेतना को बदला जाता है। यूनीवार्ता को दिये एक साक्षात्कार में श्री दासपटनायक ने बताया, "मैं दुनिया में लगातार हो रहे युद्धों, बदले की भावना और अत्याचारों को देखकर परेशान था।"श्री दासपटनायक ने कहा, "ऐसे समय में भारत दुनिया का 'आध्यात्मिक गुरु' बनने और दुनिया को इस अव्यवस्था से बचाने की अपनी कोशिशों को कैसे आगे बढ़ा सकता है, यही हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती है। मुझे लगा कि भारत माता की संतानों के बीच प्रेम, सुंदरता और आपसी भाईचारे का बीज बोना चाहिए, जिसे हम 'वसुधैव कुटुंबकम' कहते हैं।" आज के हालात, खासकर ईरान-इज़रायल संघर्ष, हमें याद दिलाते हैं कि बाहर की शांति के लिए भीतर की जागरूकता बहुत जरूरी है।

श्री दासपटनायक का मुख्य संदेश है कि आध्यात्मिक विकास और दुनिया के प्रति हमारी जिम्मेदारी अलग-अलग नहीं हैं। आज के कठिन समय से निपटने के लिए नैतिक चेतना, सामूहिक जागरूकता और खुद को अनुशासन में ढालना बहुत जरूरी है।

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