कोलकाता , जून 12 -- पश्चिम बंगाल में 15 साल से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस (तृणमूल ) के भीतर अंदरूनी मतभेद और पार्टी छोड़ने की संभावनाओं को लेकर चल रही अटकलों के बीच शुक्रवार को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने संगठन का पुरजोर बचाव किया।

सांसद महुआ मोइत्रा और सौगत रॉय ने उन बागी विधायकों और सांसदों पर तीखे हमले किए जो कथित तौर पर राजनीतिक विकल्प तलाश रहे हैं। कृष्णानगर की सांसद मोइत्रा ने सोशल मीडिया पर उन तृणमूल सांसदों/विधायकों गद्दार बताते हुए कहा कि पार्टी के भीतर एक अलग समूह बनाने की कोशिशों का कोई संवैधानिक आधार नहीं है।

श्रीमती मोइत्रा ने तर्क दिया कि 2003 में 91वें संविधान संशोधन के जरिए राजनीतिक दल में विभाजन की अनुमति देने वाले प्रावधानों को हटा दिया गया था। उन्होंने कहा कि विद्रोह का समर्थन करने वाले सांसदों या विधायकों की संख्या तब तक कोई मायने नहीं रखती जब तक कि मूल राजनीतिक दल के दो-तिहाई सदस्य औपचारिक रूप से किसी अन्य मान्यता प्राप्त राजनीतिक संगठन में विलय न कर लें।

उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, "गद्दार तृणमूल सांसदों को कानून की जानकारी नहीं है। संविधान के 91वें संशोधन (2003) ने विभाजन/अलग समूह बनाने के प्रावधान को खत्म कर दिया था। सांसदों की संख्या अप्रासंगिक है। मूल राजनीतिक दल के दो-तिहाई सदस्यों को किसी अन्य पार्टी में विलय करना होगा। सभी 19 गद्दारों को इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहिए।"श्रीमती मोइत्रा ने हमेशा खुद को पार्टी प्रमुख ममता बनर्जी का वफादार दिखाया है। चार मई को विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद पार्टी के कुछ हिस्सों में असंतोष की खबरों के बीच उन्होंने बार-बार तृणमूल नेतृत्व के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई है।

इसी क्रम में श्री रॉय ने उन नेताओं की आलोचना की जो कथित तौर पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं। उन्होंने ऐसी राजनीतिक चालों को अनैतिक बताया।

पार्टी के भीतर असंतुष्ट आवाज़ों की खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए श्री रॉय ने कहा, "मेरी नज़र में इतनी जल्दी पार्टी बदलना या राजग में शामिल होने की बात करना अनैतिक है।"वरिष्ठ सांसद ने चुनावी हार के बाद चुने हुए प्रतिनिधियों के पार्टी से दूर होने के चलन पर चिंता जताई।

उन्होंने कहा कि मौकापरस्त गठबंधनों के बजाय वैचारिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक जवाबदेही को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। श्री रॉय ने पार्टी नेतृत्व के कुछ हिस्सों और बागी विधायकों के बीच बढ़ते तनाव पर भी बात की और अनुशासन व एकता की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, खासकर ऐसे समय में जब तृणमूल हाल के वर्षों के अपने सबसे चुनौतीपूर्ण राजनीतिक दौर से गुज़र रही है।

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में तृणमूल के खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी के कुछ सांसदों और विधायकों में असंतोष की लगातार खबरें आ रही हैं। इसी माहौल में श्रीमती मोइत्रा और श्री रॉय के बयान आए हैं।

हालांकि, पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में शामिल होने की अटकलें राजनीतिक चर्चाओं में छाई हुई हैं, लेकिन पार्टी नेतृत्व यह साफ संदेश देने के लिए दृढ़ है कि असंतुष्टों को राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों तरह के विरोध का सामना करना पड़ेगा।

फिलहाल, तृणमूल का शीर्ष नेतृत्व एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रहा है, जबकि पार्टी के अंदर फूट की अफवाहें राज्य भर में राजनीतिक बहस को हवा दे रही हैं।

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