कासरगोड , जून 28 -- केरल के कासरगोड जिले में एक मुस्लिम महिला ने कैंसर से जान गंवाने वाले एक हिंदू बुजुर्ग का उनके धार्मिक रीति-रिवाजों से अंतिम संस्कार किया।

सांप्रदायिक सौहार्द और इंसानियत की यह अनूठी मिसाल तब सामने आयी जब बुजुर्ग की मौत के बाद जब उनके परिवार ने ही शव लेने से इनकार कर दिया तो यह महिला उनके अंतिम समय में वह बेटी बनीं जो उनके जीवन में कभी नहीं थी। कासरगोड जिला पंचायत की विकास स्थायी समिति की अध्यक्ष इरफाना इकबाल के धार्मिक दीवारों से ऊपर उठकर दिल को छू लेने वाले इस काम ने पूरे केरल के लोगों का दिल जीत लिया है।

मंजेश्वरम के चिगुरूपादावु के रहने वाले 64 वर्षीय नारायणन करीब एक महीने पहले सड़क किनारे एक दुकान के बाहर बेहद कमजोर और भूखे-प्यासे मिले थे। स्थानीय वार्ड सदस्य से जानकारी मिलने के बाद सुश्री इरफाना ने जिला प्रशासन और एक सामाजिक संस्था के स्वयंसेवकों की मदद से उन्हें वहां से निकाला और इलाज का इंतजाम कराया। नारायणन को पहले पास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया और बाद में कोझिकोड सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर कर दिया गया। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें आखिरी स्टेज का कैंसर है। हफ्तों चले इलाज के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका और गुरुवार को उन्होंने दम तोड़ दिया।

उनकी मृत्यु के बाद पुलिस ने शव को सौंपने के लिए उनके रिश्तेदारों से संपर्क किया। लेकिन परिवार ने शव लेने से साफ मना कर दिया। उनके अंतिम संस्कार के लिए कोई आगे नहीं आया।

ऐसे समय में सुश्री इरफाना आगे आयीं और उन्होंने उस बुजुर्ग की अंतिम यात्रा की जिम्मेदारी उठायी, जिन्हें वह प्यार से 'नारायणेट्टन' (नारायण भाई) कहती थीं। उप्पला के हिंदू श्मशान घाट में उन्होंने हर रस्म को हिंदू परंपराओं के अनुसार पूरा कराया और उन्हें वह गरिमापूर्ण विदायी दी, जिससे अपनों ने उन्हें महरूम कर दिया था।

बाद में सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट में सुश्री इरफाना ने लिखा, "कोई करीबी रिश्तेदार नहीं आया। मैंने एक बेटी के फर्ज की तरह 'नारायणेट्टन' का अंतिम संस्कार किया। इंसानियत, धर्म और राजनीति से बहुत ऊपर है।"उन्होंने कहा कि इस अनुभव ने उनके इस विश्वास को और मजबूत किया है कि सेवा और हमदर्दी को कभी भी धर्म या पहचान के दायरे में नहीं बांधा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि लावारिस और बेसहारा लोगों की देखभाल करना हम सबकी साझी सामाजिक जिम्मेदारी है।

सुश्री इरफाना ने बताया कि इस सामाजिक संस्था से जुड़े स्वयंसेवक नियमित रूप से लावारिस लोगों का उनके संबंधित धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार करते हैं। उन्होंने साफ किया कि उनके इस फैसले पर उनके समाज या समुदाय की तरफ से कोई आपत्ति नहीं जतायी गयी।

उनके इस कदम की हर तरफ तारीफ हो रही है। लोग इसे आपसी भाईचारे की एक दुर्लभ और प्रेरणादायक मिसाल बता रहे हैं, जहां सभी पूर्वाग्रहों को पीछे छोड़कर इंसानियत की जीत हुई और एक अनजान शख्स किसी के आखिरी पलों में उसका अपना परिवार बन गया।

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