दरभंगा , फरवरी 17 -- लब्ध प्रतिष्ठित उर्दू साहित्यकार एवं प्रख्यात शिक्षाविद् डॉ. मुस्ताक अहमद ने मंगलवार को कहा कि मिर्ज़ा ग़ालिब का कलाम इंसान के जज्बात, उसकी खुशी-गम और दोस्ती को केंद्र में रखता है, जो सदाबहार है।
ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय उर्दू विभाग एवं डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आज आयोजित "आधुनिक युग मे कलामे ग़ालिब की प्रासंगिकता" विषयक राष्ट्रिय सेमिनार को संबोधित करते हुए बतौर मुख्य डॉ. मुस्ताक अहमद ने कहा कि ग़ालिब के शेर केवल प्रेम या विरह नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक तर्कवाद और अस्तित्व संबंधी संघर्षों को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि ग़ालिब के कलाम जीवन के संघर्षों को हताशा के बजाय एक चुनौती के रूप में बतलाता है, जो आज के समय में लोगों को प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि गालिब का कलाम आज के बदलते दौर, सामाजिक उथल-पुथल, अकेलेपन और दार्शनिक जिज्ञासाओं के बीच अपनी गहरी छाप छोड़ता है।
डॉ. मुस्ताक ने ग़ालिब के एक शेर "न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता, डुबोया हमको होने ने, न होता मैं तो क्या होता" की व्याख्या करते हुए कहा कि ये हिन्दुस्तान के सरजमी पर ही कहा जा सकता है, जिसको हिन्दोस्तान की रवायत कहे या वैदिक संस्कृति कहे का पूरा ज्ञान न हो वो ये नहीं लिख सकता है।इसलिये ग़ालिब पर कोई ग़ालिब न हुआ।
पूर्व उर्दू विभागाध्यक्ष एवं सेमिनार के संयोजक प्रोफेसर मोहम्मद आफ़ताब अशरफ ने सेमिनार को संबिधित करते हुये कहा कि ग़ालिब के कलाम की विशेषता है कि जो कुछ सम्मुख है चाहे वो कायनात की समस्या हो या संस्कृति के दृश्य हों या धर्मिक रीति-रिवाज। ग़ालिब इनको अंतिम चिन्ह नहीं समझते।
सेमिनार की अध्यक्षता करते हुए उर्दू विभागाध्यक्ष प्रोफेसर मोहम्मद इफ़्तेख़ार अहमद ने कहा कि ग़ालिब का काव्य उर्दू संस्कृति की प्रतिष्ठा है।
सेमिनार का संचालन असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद मोतिउर रहमान ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने किया।
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