दरभंगा , जनवरी 12 -- मिथिला के गौरवशाली इतिहास की साक्षी रहीं दरभंगा राज की अंतिम महारानी कामसुंदरी देवी का अंतिम संस्कार सोमवार को संध्या माधेश्वर प्रांगण स्थित उनके पैतृक श्मशान घाट में संपन्न हुआ।
निसंतान महारानी को मुखाग्नि उनके भतीजे के पुत्र रत्नेश्वर सिंह ने दिया।
आज तड़के स्थानीय कल्याणी निवास में उनका निधन हो गया था। वह 93 वर्ष की थीं और पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रही थीं। उनके निधन के साथ ही दरभंगा राज की जीवंत स्मृतियों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।
महारानी कामसुंदरी देवी, दरभंगा राज के अंतिम महाराजा महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह की तीसरी पत्नी थीं। उनका जन्म 22 अक्टूबर 1932 को मधुबनी जिले के मंगरौनी गांव में हुआ था। महज आठ वर्ष की आयु में उनका विवाह महाराजा कामेश्वर सिंह से हुआ। अक्टूबर 1962 में महाराजा के निधन के बाद महारानी ने 64 वर्षों तक वैधव्य जीवन व्यतीत किया।
गौरतलब है कि 16वीं शताब्दी में खंडवाला राजवंश का अभ्युदय हुआ जिसके अधिष्ठाता महेश ठाकुर माने जाते हैं। 18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के समय दरभंगा राज को जमींदार की श्रेणी में ला दिया गया, बावजूद इसके दरभंगा राज में राज्य की अविभाज्यता की परंपरा को बरकरार रखा गया, जिसके अंतिम राजा महाराजा कामेश्वर सिंह और उनकी तीसरी महारानी कामसुंदरी का आज इस दुनिया को छोड़ गईं। 1962 के अक्टूबर माह में कामेश्वर सिंह के निधन होने के बाद महारानी काम सुंदरी देवी ने 64 वर्ष का वैधव्य जीवन व्यतीत किया। सादे वस्त्र में रहने वाली सभी प्रकार की चकाचौंध और राजसी परिवेश से दूर होते हुए महारानी दया, प्यार, करुणा और सद्भावना की प्रतिमूर्ति थी।
महारानी खुद निसंतान थी, लेकिन समाज को ही अपनी संतान मानकर शिक्षा धर्म एवं अन्य सामाजिक कार्यों में योगदान देते हुए जीवन व्यतीत कर दिया। दरभंगा राज परिवार से जुड़ी मराठी मूल की एक महिला शिक्षिका गंगाबाई से महारानी कामसुंदरी देवी ने अंग्रेजी समेत विभिन्न विषयों की शिक्षा प्राप्त की।
मिथिला, मैथिली और दरभंगा राज परिवार के इतिहास पर पकड़ रखने वाले इतिहासकार डॉ. शंकर देव झा ने बताया कि दरभंगा राज, बिहार के मिथिला क्षेत्र का एक शक्तिशाली और समृद्ध रजवाड़ा रहा है। जिसकी स्थापना 16वीं सदी में हुई। यह शिक्षा, कला और सामाजिक कार्यों में अपने योगदान के लिए जाना जाता है। इसकी शुरुआत हुई थी, जब मुगल सम्राट अकबर ने 1577 में महेश ठाकुर को तिरहुत का कार्यवाहक (गवर्नर) नियुक्त किया था , जिससे इस इलाके में खंडवला ब्राह्मण परिवार की शक्ति बढ़ी और पश्चात 18वीं शताब्दी में माधव सिंह ने दरभंगा को अपनी राजधानी बनायी। ब्रिटिश काल में, यह भारत के सबसे बड़े जमींदारों में से एक था, जो लगभग 24,000 वर्ग मील में फैला था और इसमें कई 110 से अधिक परगने शामिल थे। इस परिवार की संपत्तियाँ देश-विदेशों में भी थीं, और इसके पास निजी हवाई जहाज और ट्रेन जैसी सुविधाएं थीं, जो इसकी भव्यता दर्शाती है।
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