दरभंगा , अक्टूबर 26 -- ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग, प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग तथा डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को 'मिथिला का पुरातात्विक इतिहास' विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें विशेषज्ञों ने मिथिला की समृद्ध पुरातात्विक विरासत के संरक्षण और वैज्ञानिक शोध पर जोर दिया।भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के पूर्वी क्षेत्र, कोलकाता के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक डॉ. फणिकान्त मिश्र ने कहा कि मिथिला का पुरातात्विक इतिहास काफी समृद्ध एवं उन्नत है। इसे संरक्षित करने के साथ इस पर वैज्ञानिक तरीके से शोध करने की जरूरत है। उन्होंने शतपथ ब्राह्मण और वाल्मीकि रामायण के संदर्भों का उल्लेख करते हुए मिथिला की प्राचीन ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परंपरा पर प्रकाश डाला।
डॉ. मिश्र ने कहा कि बलिराजगढ़ की खुदाई से मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त और पाल काल तक की प्राचीन बस्तियों तथा सांस्कृतिक निरंतरता के प्रमाण मिले हैं। उन्होंने बासुअड़-बाबूबरही क्षेत्र स्थित बलिराजगढ़ के पुरातात्विक महत्व का उल्लेख करते हुए बौधायन, उच्चैठ स्थान और सहरसा के महिषी स्थान जैसे ऐतिहासिक स्थलों की भी चर्चा की। उन्होंने मिथिला क्षेत्र में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण का केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता जताई, जिससे यहां पुरातात्विक अनुसंधान एवं संरक्षण के कार्य व्यवस्थित रूप से हो सकें।
मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. पुनीता झा ने मिथिला के प्राचीन गढ़ों और मंदिरों के समुचित संरक्षण पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पुरातत्त्व से संबंधित उनका शोध प्रोजेक्ट शीघ्र प्रकाशित किया जाएगा।
प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभागाध्यक्ष डॉ.अमीर अली खान ने कहा कि पुरातत्त्व मिथिला की प्राचीन पहचान को सामने लाने का महत्वपूर्ण माध्यम है। इस दिशा में योजनाबद्ध और संगठित तरीके से काम करने की जरूरत है। नई पीढ़ी के शोधार्थियों के इस क्षेत्र में आगे आने से मिथिला के इतिहास को नए दृष्टिकोण से समझने में मदद मिलेगी।
संगोष्ठी के संयोजक डॉ. आर. एन. चौरसिया ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि वैज्ञानिक पुरातात्विक प्रमाणों और साहित्यिक स्रोतों के समुचित अध्ययन से प्राचीन मिथिला के इतिहास को अधिक प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। उन्होंने पुरातात्विक विरासत के संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान को महत्वपूर्ण दायित्व बताया।
अध्यक्षीय संबोधन में संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ.कृष्णकान्त झा ने कहा कि मिथिला में अभिलेख, मुद्राएं, पांडुलिपियां और साहित्यिक प्रमाण जैसे अनेक पुरातात्विक स्रोत उपलब्ध हैं। इन्हें प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। उन्होंने आयोजन की सफलता के लिए सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ शिवानी और कुमकुम के मंगलाचरण से हुआ। अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर संगोष्ठी का उद्घाटन किया। उन्हें पाग, चादर और पौधे देकर सम्मानित किया गया। संगोष्ठी में शामिल शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को फाउंडेशन की ओर से प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। कुमकुम कुमारी ने कार्यक्रम का संचालन किया, जबकि फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।
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