एजल , मई 10 -- मिजोरम स्थित जो पुनर्मिलन संगठन (जोरो) ने न्यूयॉर्क में आयोजित संयुक्त राष्ट्र के स्वदेशी मुद्दों पर स्थायी मंच (यूएनपीएफआईआई) के 25वें सत्र के दौरान म्यांमार, बांग्लादेश और मणिपुर (भारत) में फैले जो जातीय समुदायों (जोफेट) के उत्पीड़न, विस्थापन और उनकी पहचान के सामने आने वाली चुनौतियों का मुद्दा उठाया है।
यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र के स्वदेशी मुद्दों पर स्थायी मंच के सत्र के दौरान उठाया गया, जहां जोरो के प्रतिनिधि लालनुनफेला चॉन्गथू ने जोरो और जो स्वदेशी मंच (जेडआईएफ) की ओर से प्रतिनिधियों को संबोधित किया।
श्री चॉन्गथू ने संगठन द्वारा जारी एक प्रेस बयान में बताया कि जो जातीय समूह के लोग एक ही वंश, संस्कृति और परंपराओं को साझा करने के बावजूद कई देशों में बंटे हुए हैं। उन्होंने कहा कि म्यांमार की चिन पहाड़ियों, बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी इलाकों और भारत के मणिपुर में रहने वाले जो समुदाय गंभीर कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं और उनमें से कई अपने पुश्तैनी घरों से विस्थापित हो गए हैं।
श्री चॉन्गथू ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से जो लोगों को उनकी मंजूरी और सहमति के बिना तीन देशों में अलग कर दिया गया था, जिससे उनकी एकता को बनाए रखने के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत की रक्षा करने में लंबे समय से कठिनाइयां पैदा हो गई हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि म्यांमार, बांग्लादेश और मणिपुर में जो स्वदेशी समुदायों को उनकी संबंधित सरकारों द्वारा उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है और वे अपनी पारंपरिक भूमि पर शांतिपूर्वक रहने में असमर्थ हैं।
जोरो नेता ने भारत सरकार द्वारा भारत-म्यांमार सीमा पर प्रस्तावित बाड़बंदी की भी कड़ी आलोचना की और इस कदम को स्वदेशी अधिकारों का उल्लंघन तथा संयुक्त राष्ट्र घोषणा (यूएनडीआरआईपी) के सिद्धांतों के विपरीत बताया। उनके अनुसार सीमा पर बाड़ लगाने से दोनों तरफ रहने वाले जो समुदायों के बीच विभाजन और गहरा होगा तथा भारत और म्यांमार के लोगों के बीच लंबे समय से चले आ रहे जातीय, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंध कमजोर होंगे।
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