नैनीताल , अगस्त 13 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 2013 में सात वर्षीय बच्चे के कथित यौन उत्पीड़न और हत्या के मामले में गुरुवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी अमित कौशल को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायालय ने देहरादून की विशेष अदालत द्वारा वर्ष 2018 में सुनाई गई सजा को निरस्त करते हुए आरोपी की रिहाई के आदेश दिए हैं।
यह मामला 23 अगस्त 2013 का है। देहरादून जिले के डोईवाला क्षेत्र में अपने घर से सात वर्षीय मासूम अचानक लापता हो गया था। अगले दिन उसका शव अभियुक्त के पारिवारिक परिसर में खड़ी एक कार से बरामद हुआ था। बच्चे के पिता की शिकायत पर पुलिस ने हत्या, साक्ष्य मिटाने और अन्य गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जांच शुरू की थी।
जांच के बाद पुलिस ने अमित कौशल को गिरफ्तार कर आरोप पत्र दाखिल किया। इसके बाद देहरादून की फास्ट ट्रैक कोर्ट/विशेष पॉक्सो न्यायालय ने अप्रैल 2018 में उसे भारतीय दंड संहिता की धाराओं 302, 377, 201 तथा पॉक्सो अधिनियम के तहत दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ आरोपी ने हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की।
न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का परीक्षण किया। बचाव पक्ष की अधिवक्ता ममता बिष्ट ने दलील दी कि अभियोजन पक्ष अपराध से आरोपी का सीधा संबंध स्थापित नहीं कर पाया और मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है।
खंडपीठ ने पाया कि जिस कार से बच्चे का शव बरामद हुआ, उसके संबंध में अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि उसका विशेष नियंत्रण या मालिकाना हक केवल आरोपी के पास था। जांच के दौरान कार की चाबी भी आरोपी के पास नहीं, बल्कि परिवार की एक अन्य सदस्य के पास होने की बात सामने आई। इसके अलावा फॉरेंसिक जांच में कार की सीट अथवा कवर पर रक्त या कथित यौन अपराध से संबंधित कोई महत्वपूर्ण साक्ष्य नहीं मिला।
अदालत ने उच्चतम न्यायालय के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का इस्तेमाल अभियोजन पक्ष की कमजोरियों को दूर करने के लिए नहीं किया जा सकता। केवल संयुक्त पारिवारिक परिसर में खड़ी कार से शव बरामद होने के आधार पर आरोपी को हत्या का दोषी नहीं माना जा सकता।
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