नयी दिल्ली , अगस्त 28 -- मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने शुक्रवार को राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के ज़ी ग्रुप के संस्थापक एवं चेयरमैन सुभाष चंद्रा से पुनर्भुगतान योजना से जुड़े आदेश को रद्द करने की मांग की।
पार्टी ने आरोप लगाया कि यह फैसला आम करदाताओं और छोटे जमाकर्ताओं की कीमत पर बड़े कॉरपोरेट डिफॉल्टरों को अनुचित राहत देने के ढर्रे को दर्शाता है।
माकपा के पोलित ब्यूरो के जारी बयान में 22,006.57 करोड़ रुपये के कुल दावों के मुकाबले महज 6.5 करोड़ रुपये की पुनर्भुगतान योजना की मंजूरी की कड़ी आलोचना की गयी और इसे "निष्पक्ष न्याय के सिद्धांतों का मज़ाक" बताया गया।
पार्टी ने कहा, "जी ग्रुप के संस्थापक और चेयरमैन सुभाष चंद्रा से जुड़े 22,006.57 करोड़ रुपये के दावों के एवज में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण के महज 6.5 करोड़ रुपये के पुनर्भुगतान योजना को दी गयी मंजूरी निष्पक्ष न्याय के सिद्धांतों का मजाक है।"माकपा ने प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाये और आरोप लगाया कि भाजपा और संघ परिवार से सुभाष चंद्रा की नजदीकियों की जांच होनी चाहिए। पार्टी ने कहा कि यह आदेश 'न्यायाधिकरण के वर्ग पक्षपात का स्पष्ट प्रदर्शन' है और आरोप लगाया कि यह पक्षपात के खिलाफ मौलिक न्यायिक सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
पार्टी के अनुसार इस समझौते के कारण ऋणदाताओं को 99.97 प्रतिशत का नुकसान उठाना पड़ेगा। पार्टी ने एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस का हवाला देते हुए दावा किया कि 1,322.39 करोड़ रुपये के बकाये के एवज में कंपनी को केवल 38 लाख रुपये के भुगतान की मंजूरी दी गयी है, जो इसके कुल दावे का महज 0.028 प्रतिशत है।
माकपा ने आरोप लगाया कि यह घटनाक्रम कोई अलग-थलग मामला नहीं है, बल्कि उस व्यापक ढर्रे को दर्शाता है, जिसमें बड़े कॉरपोरेट घराने अपनी देनदारियों में भारी कटौती कराने में सफल हो जाते हैं।
पार्टी ने कहा, "यह गंभीर चिंता का विषय है कि न्यायाधिकरण के फैसले एक लगातार जारी ढर्रे को दिखाते हैं, जिसमें बड़े कॉरपोरेट घरानों को बार-बार जनता के पैसे की भारी हेराफेरी करने की छूट दी जाती है।"पार्टी ने आरोप लगाया कि प्रभावशाली कॉरपोरेट कर्जदारों को भारी-भरकम कर्ज उठाने की अनुमति दी जाती है और बाद में उनकी देनदारियों का भारी छूट के साथ निपटान कर दिया जाता है।
बयान में कहा गया, "दब्बू सरकार जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों को अप्रत्याशित मुनाफा कमाने देती है और उन्हें विशाल कर्ज लेने की छूट देती है। फिर कुछ वर्षों बाद एनसीएलटी मौजूदा मामले की तरह भारी छूट के साथ उनके कर्ज का निपटान कर देता है।"वामपंथी दल ने तर्क दिया कि इस तरह के निपटानों का बोझ आखिरकार करदाताओं और छोटे जमाकर्ताओं पर पड़ता है। पार्टी ने सवाल उठाया कि जब आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को अपेक्षाकृत छोटे कर्ज न चुका पाने पर कठोर कार्रवाई का सामना करना पड़ता है, तो आम नागरिकों को बड़े पैमाने पर कॉरपोरेट डिफॉल्ट का खामियाजा क्यों भुगतना चाहिए।
माकपा ने कहा, "राजनीतिक रूप से प्रभावशाली सांठगांठ वाले पूंजीपतियों को भारी कर्ज बांटा जा रहा है और फिर 'हेयरकट' (कर्ज में माफी) के नाम पर उन्हें उबारा जा रहा है।"पार्टी ने यह भी कहा कि ऐसी राहत एक बुद्धिमत्तापूर्ण आर्थिक उपाय के बजाय "सत्ताधारी दल को दी गयी सेवाओं का उदार इनाम" प्रतीत होती है।कमजोर वर्गों के वित्तीय संकट की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए पार्टी ने कहा कि किसान, कृषि मजदूर, महिलाएं और दिहाड़ी मजदूर कर्ज न चुका पाने पर अक्सर धमकियों, डराने-धमकाने, अपमान और बेदखली का सामना करते हैं और कुछ तो आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाते हैं।
माकपा ने भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों का भी हवाला देते हुए दावा किया कि घरेलू कर्ज सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 45.5 प्रतिशत के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गया है। जहां कृषि ऋण माफी की अक्सर आर्थिक रूप से अव्यावहारिक कहकर आलोचना की जाती है, वहीं कॉरपोरेट देनदारियों में हजारों करोड़ रुपये बट्टे खाते में डाले जा रहे हैं या भारी छूट पर निपटाये जा रहे हैं।
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत प्राप्त जानकारी का हवाला देते हुए पार्टी ने कहा कि एक करोड़ रुपये तक का कर्ज लेने वाले छोटे कर्जदारों की लोन रिकवरी दर 74 प्रतिशत थी, जबकि 100 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज लेने वाले बड़े कर्जदारों के मामले में यह केवल 14.5 प्रतिशत थी।
माकपा ने एनसीएलटी के आदेश को पलटने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की और केंद्र सरकार से जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों को संरक्षण देने और पुरस्कृत करने की इस नीति को समाप्त करने का आह्वान किया।
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