भदोही , सितंबर 1 -- मां की ममता और संतान के प्रति अटूट प्रेम का प्रतीक ललई छठ यानी हलषष्ठी का पर्व बुधवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को पड़ने वाले इस पर्व पर माताएं संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखेंगी।

पूर्वांचल के भदोही सहित आसपास के जिलों में पर्व को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं। ललई छठ को कई स्थानों पर हरछठ, हलछठ और हलषष्ठी के नाम से भी जाना जाता है।

पं.मिथिलेश उपाध्याय की मानें तों यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम के प्राकट्योत्सव से जुड़ा है। बलराम को हलधर कहा जाता है, इसलिए पर्व में हल, खेती और प्रकृति से जुड़ी परंपराओं का विशेष महत्व है। इस दिन माताएं षष्ठी माता और भगवान बलराम का स्मरण कर व्रत रखती हैं। पूजा के बाद व्रत कथा सुनी जाती है, तथा संतान की रक्षा और उसके सुखी जीवन की कामना की जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं सामूहिक रूप से पूजा करने के साथ पारंपरिक लोकगीत भी गाती हैं।

हलषष्ठी के व्रत में खान-पान के विशेष नियम हैं। मान्यता है कि इस दिन हल से जुती जमीन में पैदा हुए अनाज का सेवन नहीं किया जाता। इसके स्थान पर तिन्नी यानी पसई के चावल और महुआ का प्रयोग करने की परंपरा है। कई क्षेत्रों में गाय के दूध-दही से परहेज कर भैंस के दूध से बने पदार्थों के सेवन की परंपरा भी है। हालांकि पूजा और खान-पान के नियम स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

पूजा में कुश घास, महुआ के पत्ते, तिन्नी के चावल, फल-फूल और अन्य स्थानीय सामग्री का प्रयोग किया जाता है। महिलाएं पूजा के बाद ललई छठ की कथा सुनकर परिवार की सुख-शांति और संतान की मंगलकामना करती हैं।

ललई छठ से जुड़ी लोककथा में ग्वालिन और उसके पुत्र का उल्लेख मिलता है। लोकमान्यता के अनुसार व्रत के नियमों का पालन नहीं करने पर उसके पुत्र पर संकट आया। बाद में ग्वालिन ने पश्चाताप कर व्रत के नियमों का पालन किया और देवी-देवताओं की कृपा से उसका पुत्र जीवित हो गया।

ललई छठ संतान की मंगलकामना के साथ खेती, प्रकृति और श्रम के सम्मान का संदेश भी देता है। हल और खेत को महत्व देने वाली यह परंपरा किसानों के परिश्रम और प्रकृति के प्रति सम्मान की याद दिलाती है।

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