मांड्या , जुलाई 21 -- "खेती का मतलब सिर्फ फसल उगाना और उसे बाजार में बेचना नहीं है। यह बड़े चमत्कार कर सकती है।" इसी सोच ने कर्नाटक के मांड्या जिले में पांच एकड़ के एक खेत को वैश्विक कृषि-पर्यटन स्थल में बदल दिया है।

यहां दुनिया भर से आने वाले लोग धान की रोपाई करने, फसल काटने और ग्रामीण जीवन का अनुभव लेने के लिए भुगतान करते हैं। इससे किसान को हर साल लगभग 10 लाख रुपये की कमाई हो रही है।श्रीरंगपट्टण तालुक के पलाहल्ली गांव के किसान वेंकटेश ने एक अनोखा मॉडल अपनाया है। इसमें मेहमान अपनी मर्जी से भुगतान करते हैं। वे रहने, खाने या खेत की सैर के लिए कोई तय शुल्क नहीं लेते, बल्कि आने वाले मेहमानों को अनुभव के हिसाब से जो सही लगे, वही देने की छूट देते हैं।

श्री वेंकटेश की इस पहल ने आयरलैंड, फ्रांस, हंगरी, जिम्बाब्वे और ऑस्ट्रेलिया के अलावा भारत के कई राज्यों के लोगों को आकर्षित किया है। ये लोग 10 से 15 दिनों तक खेत पर रहकर आम मजदूरों की तरह जैविक खाद उठाना, धान की रोपाई करना और फसल काटना, जैसे काम करते हैं। ये लोग गांव के माहौल का आनंद लेते हुये किसानों की दिक्कतों को करीब से समझते हैं।

श्री वेंकटेश को यह विचार तक आया, जब उन्होंने बेंगलुरु के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के विशेषज्ञों फ्रैंकलिन और संगीता की सलाह पर रसायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती अपनायी। बाद में उन्होंने अपने खेत का पंजीकरण 'वूफ' और 'वर्कअवे' जैसे अंतरराष्ट्रीय सेवा संगठनों के मंचों पर कराया। इससे यह छोटा सा गांव वैश्विक पटल पर आ गया।

खेत पर हर साल लगभग 15 दल आते हैं। हर दल में करीब चार लोग होते हैं। विदेशी मेहमानों को पुलिस जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही रुकने की इजाजत दी जाती है।

श्री वेंकटेश मेहमानों से किसी फीस की मांग नहीं करते। इसके बजाय, खेती के अनुभव का आनंद लेने के बाद पर्यटक जाते समय खुशी से अपनी मर्जी से भुगतान कर देते हैं। यह एक ऐसा जरिया है जिससे सालाना करीब 10 लाख रुपये की कमाई हो जाती है।

श्री वेंकटेश कृषि-पर्यटन के अलावा धान की देसी किस्मों, मोटे अनाज, फल और सब्जियों की खेती के साथ-साथ गिर, साहीवाल और हल्लीकर नस्ल की गायों व बकरियों का पालन, मछली पालन और केंचुआ खाद बनाकर एकीकृत खेती करते हैं। उनके खेत के डेयरी उत्पाद भी स्थानीय स्तर पर बेचे जाते हैं।

उनका खेत अब एक प्रशिक्षण केंद्र के रूप में भी विकसित हो चुका है, जहां कृषि, उद्यान और पशुपालन विभाग के अधिकारी जैविक खेती और मृदा संरक्षण पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करते हैं। श्री वेंकटेश का यह प्रयोग इस बात की मिसाल बन चुका है कि जो लोग खेती को अब फायदे का सौदा नहीं मानते, वे टिकाऊ खेती को ग्रामीण पर्यटन और ज्ञान साझा करने के साथ जोड़कर एक नयी राह चुन सकते हैं।

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