महोबा , नवम्बर 02 -- उत्तर प्रदेश के महोबा जिले मे दिव्यांगजनों को हुनरमंद बनाकर आत्मनिर्भर बनाने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने की दिशा में बुंदेलखंड सोसायटी फॉर रूरल डेवलपमेंट संस्था की ओर से एक सराहनीय पहल करते हुए मानसिक दिव्यांगता, श्रवण दिव्यांगता, शारीरिक दिव्यांगता और सेरेब्रल पाल्सी से प्रभावित दिव्यांगजनों को विभिन्न प्रकार के उत्पाद बनाने का व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके जरिये दिव्यांगजनों को हुनर सीखने के साथ रोजगार के अवसरों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। सोसाइटी के अध्यक्ष आकाश राय ने बताया कि संस्था द्वारा दिव्यांगों को गाय के गोबर से रामदरबार, भगवान श्रीराम की प्रतिमा, लक्ष्मी-गणेश, राधा-कृष्ण और भगवान शिव की आकर्षक प्रतिमाएं तथा स्मृति चिह्न (मोमेंटो) तैयार करना सिखाया जा रहा है। इसके अलावा दीपावली के मद्देनजर आकर्षक दीपक, गमले और अन्य सजावटी उत्पाद भी बनाए जा रहे हैं।इन उत्पादों को तैयार करने के लिए गोशालाओं से गोबर लाया जाता है। इसके बाद उसमें इमली के बीजों से तैयार सामग्री, मैदा की लकड़ी का पाउडर, मुल्तानी मिट्टी और अन्य आवश्यक पदार्थ मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है। संस्था द्वारा बनाए गए सांचों की मदद से प्रतिमाओं और दीपकों को आकार दिया जाता है। तैयार उत्पादों को धूप में सुखाने के बाद उन पर रंग किया जाता है। दीपकों में बत्ती लगाकर और जेल भरने के बाद उनकी पैकिंग की जाती है।

श्री राय ने बताया क़ी संस्था की एक अन्य अभिनव पहल मंदिरों में देवी-देवताओं को अर्पित किए जाने वाले फूलों के सदुपयोग से जुड़ी है। आमतौर पर पूजा के बाद इन फूलों को तालाबों, नदियों और अन्य जलस्रोतों में फेंक दिया जाता है, जिससे जल प्रदूषण की समस्या बढ़ सकती है।इस समस्या के समाधान के लिए संस्था मंदिरों से चढ़े हुए फूल एकत्र करती है। इन फूलों को सुखाकर उनका पाउडर तैयार किया जाता है। इसके बाद इस पाउडर से धूपबत्ती बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इससे धार्मिक आस्था से जुड़े पुष्पों का पुनः उपयोग संभव हो रहा है और उन्हें जलस्रोतों में फेंकने की जरूरत भी कम हो सकती है।धूपबत्ती बनाने के लिए गोबर और सूखे फूलों के पाउडर के साथ कपूर, लोबान, गुग्गुल, हवन सामग्री तथा नारियल तेल सहित अन्य सामग्रियों का मिश्रण तैयार किया जाता है। इस मिश्रण से धूपबत्तियां बनाई जाती हैं। संस्था द्वारा तैयार धूपबत्ती और अन्य उत्पादों को आकर्षक रूप देने पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।संस्था का कहना है कि इन उत्पादों के निर्माण में जैविक और प्राकृतिक सामग्रियों के इस्तेमाल को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे कचरे के रूप में फेंके जाने वाले फूलों का उपयोगी उत्पादों में रूपांतरण हो रहा है और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता को भी बढ़ावा मिल रहा है।

आकाश राय के मुताबिक बुंदेलखंड सोसायटी फॉर रूरल डेवलपमेंट की यह पहल दिव्यांगजनों के कौशल विकास, आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण को एक साथ जोड़ने का प्रयास है। प्रशिक्षण के माध्यम से दिव्यांगजन हस्तनिर्मित उत्पाद तैयार करने की तकनीक सीख रहे हैं। इन उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराया जा सके तो दिव्यांगजनों के लिए आय के नए अवसर पैदा हो सकते हैं.गोबर से तैयार सजावटी प्रतिमाएं और दीपक तथा मंदिरों के फूलों से बनी धूपबत्तियां न केवल पारंपरिक आस्था और हस्तकला का संगम हैं, बल्कि संसाधनों के पुनः उपयोग की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल हैं। संस्था का यह प्रयास दिव्यांगजनों को हुनर के माध्यम से सशक्त बनाने के साथ समाज में पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देता है।

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