अलवर , अक्टूबर 15 -- दीपावली नजदीक आते ही बाजारों में मिट्टी के दीपकों की मांग बढ़ने लगी है, आधुनिक दौर में एक बार फिर पारंपरिक मिट्टी के दीपकों की ओर लोगों का रुझान फिर से बढ़ रहा है, लेकिन इन्हें बनाने वाले कुंभकारों के सामने इस बार चुनौतियां कम नहीं हैं।

चिकनी मिट्टी की कमी, कच्चे माल की बढ़ती कीमतें और बिजली कटौती ने उनके काम की रफ्तार पर लगाम लगा दी है। जिस पर्व पर मिट्टी के दीपकों से घर-आंगन रोशन होते हैं, उसी पर्व से उम्मीद लगाए बैठे कारीगरों को लागत और कमाई के बीच संतुलन बैठाना मुश्किल हो रहा है।

राजस्थान में अलवर शहर में चिकनी मिट्टी की स्थानीय उपलब्धता कम होने से कुंभकारों को दूसरे गांवों और शहरों से मिट्टी मंगवानी पड़ रही है। कारीगरों के अनुसार, पहले जिस मिट्टी के लिए करीब दो हजार रुपए खर्च करने पड़ते थे, अब उसके लिए तीन से चार हजार रुपए तक चुकाने पड़ रहे हैं। इससे दीपक, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और पूजा में प्रयुक्त मिट्टी के बर्तन तैयार करने की लागत बढ़ गई है।

रंगभरियों की गली निवासी राजेंद्र प्रजापत ने बताया कि स्थानीय स्तर पर चिकनी मिट्टी मिलना मुश्किल हो गया है। बाहर से मिट्टी मंगवाने के कारण खर्च बढ़ रहा है, जिसका सीधा असर कारोबार पर पड़ रहा है। दीपक बनाने के लिए मिट्टी लाने के बाद उसे तैयार करना, चाक पर आकार देना, सुखाना और भट्टी में पकाना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में समय, मेहनत और संसाधन लगते हैं।

कुंभकारों के लिए दूसरी बड़ी परेशानी बिजली कटौती है। राजेंद्र प्रजापत के अनुसार, अब हाथ से चलने वाले पारंपरिक चाक की जगह बिजली से चलने वाले चाक ने ले ली है। इससे दीपक बनाने का काम तेज तो हुआ है, लेकिन बिजली नहीं होने पर उत्पादन पूरी तरह रुक जाता है। इन दिनों शहर में हो रही बिजली कटौती के कारण कारीगरों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनके मुताबिक, अनुकूल परिस्थितियों में एक घंटे में करीब 400 दीपक तैयार किए जा सकते हैं। स्थानीय बाजार में मांग होने के साथ दीपक बाहर भी भेजे जा रहे हैं, लेकिन बिजली की अनियमित आपूर्ति के कारण समय पर उत्पादन करना चुनौतीपूर्ण कार्य बन रहा है।

बढ़ती लागत और मेहनत को देखते हुए कुछ कारीगर अब खुद दीपक बनाने के बजाय थोक बाजार से तैयार दीपक खरीदकर बेच रहे हैं। कारीगरों के अनुसार, थोक बाजार में 100 दीपक करीब 75 रुपए में मिल रहे हैं। ऐसे में मिट्टी खरीदने, दीपक बनाने, सुखाने, पकाने और बाजार तक पहुंचाने का खर्च बचाने के लिए तैयार दीपक बेचना कई लोगों को सुविधाजनक लग रहा है। हालांकि, इस कारोबार में वास्तविक मुनाफा बिक्री मूल्य और अन्य खर्चों पर निर्भर करता है।

कुंभकारों का काम मौसम पर भी निर्भर करता है। बरसात के दौरान मिट्टी जुटाना और दीपक बनाकर सुखाना मुश्किल होता है। इसलिए दीपावली से करीब दो महीने पहले, बरसात के अंतिम दौर में ही दीपक बनाने की तैयारी शुरू हो जाती है। इसके बाद दीपकों को सुखाने और भट्टी में पकाने में भी समय लगता है। ऐसे में उत्पादन के लिए सीमित समय मिलता है और बिजली कटौती जैसी परेशानी काम को और प्रभावित करती है।

एक कारीगर रामधन प्रजापत ने बताया कि दीपावली पर मिट्टी के दीपक जलाने की परंपरा का विशेष धार्मिक महत्व है। दीपक का प्रकाश अंधकार दूर करने और सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। बाजार में मांग बढ़ने से कुंभकारों को कारोबार बेहतर होने की उम्मीद है, लेकिन मिट्टी की महंगाई और बिजली की समस्या उनकी चिंता बढ़ा रही है।

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