बैतूल , जुलाई 28 -- मध्यप्रदेश का बैतूल जिला, जो दो दशक पहले मलेरिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल था और जहां इस बीमारी से अनेक लोगों की जान गई थी, अब मलेरिया नियंत्रण के क्षेत्र में प्रदेश के लिए एक मॉडल के रूप में उभरकर सामने आया है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वर्ष 2014 में जिले में 4,246 मलेरिया मरीज दर्ज किए गए थे, जबकि वर्ष 2026 में अब तक केवल दो मरीज मिले हैं। दोनों मरीज प्लास्मोडियम विवैक्स (पीवी) से संक्रमित हैं और संक्रमण जिले के बाहर से आया है। जिले में इस वर्ष स्थानीय स्तर पर मलेरिया संक्रमण का कोई मामला नहीं मिला है।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार वर्ष 2002 और 2003 में भीमपुर, चिचोली और शाहपुर विकासखंड मलेरिया से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में थे। घने जंगल, दुर्गम गांव और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण उस समय स्थिति अत्यंत गंभीर थी। मलेरिया से हुई मौतों और बीमारी के बढ़ते प्रकोप ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया था। उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार और प्रदेश में दिग्विजय सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान यह मुद्दा व्यापक चर्चा का विषय बना था। कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी भीमपुर विकासखंड के पाट गांव पहुंचकर प्रभावित परिवारों से मुलाकात की थी।

जिला मलेरिया अधिकारी जितेंद्र सिंह राजपूत ने बताया कि मलेरिया नियंत्रण के लिए वर्ष 2016 से अभियान को अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया। गांव-गांव बुखार सर्वे, संदिग्ध मरीजों की त्वरित जांच, समय पर उपचार, कीटनाशक छिड़काव, कीटनाशकयुक्त मच्छरदानियों का वितरण तथा जैविक नियंत्रण जैसे उपाय लगातार अपनाए गए। वर्ष 2015 में जिले में 3,600 और वर्ष 2016 में 1,946 मरीज मिले थे, जिसके बाद मामलों में लगातार कमी दर्ज की गई।

उन्होंने बताया कि मलेरिया नियंत्रण में गम्बूसिया (गाम्बूसिया एफिनिस) मछली की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मच्छरों के लार्वा को खाने वाली इस मछली के पालन के लिए जिला मलेरिया कार्यालय में विशेष हैचरी विकसित की गई है। यहां वर्षभर लाखों गम्बूसिया मछलियों का पालन किया जाता है और वर्षा ऋतु में इन्हें तालाबों, कुओं तथा अन्य जलस्रोतों में छोड़ा जाता है, जिससे मच्छरों के प्रजनन पर नियंत्रण रहता है।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार इस वर्ष तकनीक का भी उपयोग किया गया है। गूगल अर्थ की सहायता से जिले के लगभग दो हजार जलस्रोतों की पहचान की गई है, जहां करीब तीन लाख गम्बूसिया मछलियां छोड़े जाने की योजना है। विभाग का दावा है कि डिजिटल मैपिंग के माध्यम से जलस्रोतों की पहचान कर जैविक नियंत्रण लागू करने वाला बैतूल प्रदेश का पहला जिला बन गया है।

अधिकारियों के अनुसार जिले में मच्छरों की मौजूदगी तो है, लेकिन उनमें मलेरिया फैलाने वाला परजीवी नहीं पाया जा रहा है। करीब 20 सदस्यीय फील्ड टीम लगातार गांवों में निगरानी कर रही है। बुखार के प्रत्येक मरीज की स्लाइड और रैपिड टेस्ट से जांच कर संक्रमित मिलने पर तत्काल उपचार शुरू किया जाता है। वर्ष 2024 में जिले के हाई रिस्क क्षेत्रों में 2.60 लाख कीटनाशकयुक्त मच्छरदानियों का भी वितरण किया गया था।

स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि मलेरिया नियंत्रण की सफलता केवल दवाओं या कीटनाशकों का परिणाम नहीं, बल्कि वैज्ञानिक निगरानी, जैविक नियंत्रण, समय पर जांच, ग्रामीणों में बढ़ती जागरूकता और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की सतत मेहनत का संयुक्त प्रभाव है। कभी मलेरिया के कारण राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहने वाला बैतूल अब स्थानीय मलेरिया संक्रमण को शून्य पर लाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए प्रदेश में बीमारी नियंत्रण का सफल उदाहरण बन गया है।

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