, Feb. 4 -- भगवान दादा की किस्मत का सितारा वर्ष 1951 में प्रदर्शित फिल्म 'अलबेला' से चमका । राजकपूर के कहने पर भगवान दादा ने फिल्म 'अलबेला' का निर्माण और निर्देशन किया। बेहतरीन गीत-संगीत और अभिनय से सजी इस फिल्म की कामयाबी ने भगवान दादा को 'स्टार' के रूप में स्थापित कर दिया। आज भी इस फिल्म के सदाबहार गीत दर्शकों और श्रोताओंको मंत्रमुग्ध कर देते हैं । सी.राम.चंद्र के संगीत निर्देशन में भगवान दादा पर फिल्माये गीत 'शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के' उन दिनों युवाओं के बीच क्रेज बन गये थे। इसके अलावा 'भोली सूरत दिल के खोटे नाम बड़े और दर्शन छोटे', ' शाम ढ़ले खिड़की तले तुम सीटी बजाना छोड़ दो' भी श्रोतोओं के बीच लोकप्रिय हुये थे ।

फिल्म अलबेला की सफलता के बाद भगवान दादा ने झमेला, रंगीला, भला आदमी, शोला जो भड़के, हल्ला गुल्ला जैसी फिल्मों का निर्देशन किया लेकिन ये सारी फिल्म टिकट खिड़की पर असफल साबित हुयी हांलाकि इस बीच उनकी वर्ष 1956 में प्रदर्शित फिल्म 'भागम भाग' हिट रही। वर्ष 1966 में प्रदर्शित फिल्म लाबेला बतौर निर्देशक भगवान दादा के सिने करियर की अंतिम फिल्म साबित हुयी। दुर्भाग्य से इस फिल्म को भी दर्शको ने बुरी तरह नकार दिया । फिल्म 'लाबेला' की असफलता के बाद बतौर निर्देशक भगवान दादा को फिल्मों में काम मिलना बंद कर दिया और बतौर अभिनेता भी उन्हें काम मिलना बंद हो गया।

भगवान दादा को परिवार की जरूरत को पूरा करने के लिये अपना बंग्ला और कार बेचकर एक छोटे से चाल में रहने के लिये विवश होना पड़ा। इसके बाद वह माहौल और फिल्मों के विषय की दिशा बदल जाने पर भगवान दादा चरित्र अभिनेता के रूप में काम करने लगे, लेकिन नौबत यहां तक आ गई कि जो निर्माता-निर्देशक पहले उनको लेकर फिल्म बनाने के लिए लालायित रहते थे। उन्होंने भी उनसे मुंह मोड लिया। इस स्थिति में उन्होंने अपना गुजारा चलाने के लिए फिल्मों में छोटी-छोटी मामूली भूमिकाएं करनी शुर कर दीं । बाद में हालात ऐसे हो गए कि भगवान दादा को फिल्मों में काम मिलना लगभग बंद हो गया। हालात की मार और वक्त के सितम से बुरी तरह टूट चुके हिन्दी फिल्मों के स्वर्णिम युग के अभिनेता भगवान दादा ने चार फरवरी 2002 को गुमनामी के अंधरे में रहते हुये इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

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