मुंबई , अगस्त 28 -- महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों को मराठी भाषा की अनिवार्य शर्त पूरी करने के लिए दिए गए एक साल के विस्तार के खिलाफ न्यायालय जाने का फैसला किया है। यह जानकारी शुक्रवार को महाराष्ट्र नवनिर्माण वाहतूक सेना के अध्यक्ष संजय नाइक ने दी।
मनसे ने यह भी आरोप लगाया है कि मराठी न बोलने वाले चालकों को गलत तरीके से बैज और परमिट जारी किए गए और दावा किया कि इन आरोपों को साबित करने के लिए उनके पास दस्तावेज़ी सबूत हैं।
श्री नाइक ने कहा कि पार्टी 2016 से ही इस मामले को उठा रही है और उसने परमिट और बैज जारी करने के तरीके से जुड़े सबूत भी जुटाए हैं। उन्होंने कहा कि मनसे किसी ऐसे आंदोलन के बजाय कानूनी रास्ता अपनाना पसंद करेगी जिससे टकराव, पुलिस कार्रवाई और आपराधिक मामले हो सकते हैं।
श्री नाइक एक साल के विस्तार पर सवाल उठाते हुए कहा कि जिन चालकों को 2016 में परमिट मिले थे, उनसे मराठी की बुनियादी जानकारी होने की उम्मीद थी। उन्होंने तर्क दिया कि अगर वे लगभग एक दशक के बाद भी मराठी नहीं सीख पाए तो इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वे अगले एक साल में यह भाषा सीख लेंगे।
श्री नाइक ने मराठी भाषा की शर्त को लागू करने के मामले में राज्य सरकार के कामकाज पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि परिवहन मंत्री प्रताप सरनाइक ने कई महीने पहले ही यह शर्त लागू करने की घोषणा की थी लेकिन सरकार यह पता लगाने में नाकाम रही कि इस दौरान असल में कितने चालकों ने मराठी सीखी है।
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि इस विस्तार के पीछे राजनीतिक कारण हैं खासकर उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर। श्री नाइक ने दावा किया कि महाराष्ट्र के बाहर के बड़ी संख्या में चालकों के परमिट रद्द करने से उत्तर प्रदेश में राजनीतिक असर पड़ सकता है।
वाणिज्यिक चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य करने के सरकार के फ़ैसले का उल्लेख करते हुए श्री नाइक ने कहा कि मनसे कानूनी एवं लोकतांत्रिक तरीकों से इस मुद्दे को उठाना जारी रखेगी।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बैज और निवास प्रमाणपत्र जारी करने में गड़बड़ी हुई थी। उनके अनुसार, चालकों के लिए मराठी भाषा की बुनियादी जानकारी और उन इलाकों के भूगोल की जानकारी होना ज़रूरी था जहां वे गाड़ी चलाना चाहते थे।
श्री नाइक ने दावा किया कि कुछ चालकों ने कथित रूप से रहने की ज़रूरी शर्तों को पूरा किए बिना ही 15 साल का निवास प्रमाणपत्र प्राप्त किया और बाद में उन प्रमाणपत्र का इस्तेमाल परमिट पाने के लिए किया।
उन्होंने कहा कि मनसे का मानना है कि कथित अनियमितताओं में परिवहन विभाग के अधिकारी और बिचौलिए शामिल थे और इनका नतीजा अब मुंबई की सड़कों पर दिख रहा है।
मनसे नेता ने कहा कि यह मुद्दा नया नहीं है और पार्टी के अभियान की शुरुआत 2016 में हुई थी जब स्थानीय युवाओं को रोज़गार के अवसर देने के लिए ऑटो-रिक्शा और टैक्सी परमिट खोलने के कदम उठाए गए थे।
श्री नायक ने कहा कि पार्टी अब उपलब्ध सबूतों को न्यायपालिका के सामने रखेगी और बैज, निवास प्रमाणपत्र और परमिट जारी करने में हुई अनियमितताओं के खिलाफ उचित कार्रवाई की मांग करेगी।
वहीं मनसे नेता अमित ठाकरे ने ऑटो-रिक्शा और टैक्सी चालकों को चेतावनी दी कि वे मराठी बोलने से मना न करें और न ही यात्रियों के साथ बदसलूकी करें। साथ ही, उन्होंने परिवहन संचालकों के लिए मराठी भाषा के नियमों को लागू करने में ढील देने के महाराष्ट्र सरकार के फ़ैसले की आलोचना भी की।
यहां पत्रकारों से बात करते हुए श्री ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र में गाड़ी चलाने वाले चालकों को मराठी में बातचीत करने और यात्रियों के साथ सम्मान से पेश आने में सक्षम होना चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि चालकों को मराठी सीखने के लिए एक साल की मोहलत देने के राज्य के फ़ैसले से भाषा संबंधी शर्त को लागू करने की प्रक्रिया कमज़ोर हुई है और इससे एक ग़लत संदेश गया है।
हाल ही में, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने चालकों को मराठी भाषा में दक्ष होने के लिए एक साल की मोहलत देने की घोषणा की और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे उन लोगों के खिलाफ तुरंत कोई कार्रवाई न करें जिन्होंने अभी तक इस नियम का पालन नहीं किया है।
इस छूट को लेकर राज्य सरकार पर निशाना साधते हुए श्री ठाकरे ने कहा कि पूरे महाराष्ट्र में सार्वजनिक परिवहन सेवाओं में बातचीत की मुख्य भाषा मराठी ही होनी चाहिए। उनके बयानों से नई राजनीतिक प्रतिक्रियाएं शुरू हो गई हैं और राज्य में भाषा नीति को लेकर बहस फिर से छिड़ गई है।
यह मुद्दा राजनीतिक दलों और परिवहन संचालकों का ध्यानाकर्षित कर रहा है; चर्चा इस बात पर केंद्रित है कि भाषाई ज़रूरतों और चालकों को पेश आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों के बीच कैसे संतुलन बनाया जाए।
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