चेन्नई , अगस्त 18 -- मद्रास उच्च न्यायालय ने मंगलवार को सवाल उठाया कि तमिलनाडु विधानसभा में 13 मई को हुए विश्वास मत के दौरान पार्टी का ह्विप तोड़कर तमिझगा वेट्री कषगम (टीवीके) सरकार के पक्ष में वोट देने वाले अन्नाद्रमुक के 21 विधायकों को जब पार्टी ने ही माफ कर दिया, तो उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही खत्म करने में क्या गलत था?मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी अरुल मुरुगन की पीठ ने 21 विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही समाप्त करने के विधानसभा अध्यक्ष जेसीडी प्रभाकर के फैसले को चुनौती देने वाली अधिवक्ता सेल्वकुमार की जनहित याचिका पर सुनवाई की।
यह मुद्दा 13 मई को विश्वास मत के दौरान अन्नाद्रमुक के 25 'बागी' विधायकों के पार्टी ह्विप का उल्लंघन करने और टीवीके सरकार के पक्ष में मतदान करने के बाद उठा। इसके बाद अन्नाद्रमुक महासचिव एडप्पाडी के. पलानीस्वामी ने उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई की मांग की थी। पचीस विधायकों में से चार ने बाद में इस्तीफा दे दिया और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ टीवीके में शामिल हो गये। शेष 21 'बागियों' ने बाद में खेद व्यक्त किया और लिखित में माफी मांगी।
इसके बाद श्री पलानीस्वामी ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर 21 विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही शुरू करने की अपनी याचिका वापस ले ली। विधानसभा अध्यक्ष ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और कार्यवाही समाप्त कर दी, जबकि अन्नाद्रमुक छोड़ चुके अन्य चार विधायकों के खिलाफ इसे शुरू कर दिया।
जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू हुई, तो याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि राजनीतिक दलों के पास ह्विप का उल्लंघन करने वाले और पार्टी के रुख के खिलाफ वोट देने वाले विधायकों को माफ करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने दलील दी कि ह्विप का उल्लंघन कर विधायकों ने प्रभावी रूप से दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता को आमंत्रित किया था और उनकी माफी स्वीकार करना तथा कार्यवाही समाप्त करना 'संविधान का मजाक उड़ाने' के समान है।
सरकार की ओर से पेश तमिलनाडु के महाधिवक्ता विजय नारायण ने तर्क दिया कि यह मामला एक राजनीतिक दल और उसके विधायकों के बीच के संबंधों से संबंधित है। उन्होंने कहा कि चूंकि पार्टी के महासचिव ने खेद व्यक्त करने के बाद विधायकों को माफ कर दिया था, इसलिए वे पार्टी के सदस्य बने रहे। उन्होंने किसी आंतरिक पार्टी मामले में किसी तीसरे पक्ष की ओर से दायर जनहित याचिका की सुनवाई होने लायक होने पर भी सवाल उठाया।
याचिकाकर्ता तीसरा पक्ष है। उसके दावे पर सवाल उठाते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि विधायकों ने इस्तीफा नहीं दिया है और राजनीतिक दल ने खुद विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को चुनौती नहीं दी है।
पीठ ने यह भी कहा कि पार्टी ने निर्धारित 15 दिनों की अवधि के भीतर विधायकों को माफ करने के विकल्प का उपयोग किया, जिसके बाद विधानसभा अध्यक्ष ने अयोग्यता की कार्यवाही वापस ले लिया।
अदालत ने पूछा, "यदि उन्हें ह्विप का उल्लंघन करने के लिए माफ कर दिया गया है तो वे पार्टी के सदस्य के रूप में बने रहेंगे। उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया है। याचिकाकर्ता एक तीसरा पक्ष है और पार्टी ने खुद मामला दर्ज नहीं किया है। माफी 15 दिनों के भीतर दी गयी थी और विधानसभा अध्यक्ष ने इसे स्वीकार कर लिया है। इसमें क्या गलत है?"पीठ ने कहा कि वर्तमान चरण में विधायकों के खिलाफ कोई दलबदल की कार्यवाही लंबित नहीं है।
दलीलों को सुनने के बाद न्यायालय ने मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।
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