चेन्नई , सितंबर 10 -- मद्रास उच्च न्यायालय ने अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (अन्नाद्रमुक) की याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया है।

अन्नाद्रमुक ने अपनी याचिका में तमिलनाडु विधानसभा में पारित उस प्रस्ताव में किए गए संशोधन को रद्द करने की मांग की है, जिसमें कावेरी नदी पर कर्नाटक द्वारा मेकेदातु में संतुलन जलाशय परियोजना बनाने के कदम का विरोध करते हुए एक नया न्यायाधिकरण गठित करने की मांग की गयी थी।

राज्य विधानसभा में अन्नाद्रमुक के पूर्व मंत्री और सचेतक एग्री. एस. एस. कृष्णमूर्ति की ओर से दायर याचिका पर दोनों पक्षों की अंतिम दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति एस. ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की प्रथम पीठ ने बुधवार शाम अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

उल्लेखनीय है कि 19 जून को मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय द्वारा पेश किए गये प्रस्ताव पर चर्चा पूरी होने और उसे पारित किए जाने से पहले इसमें एक संशोधन शामिल किया गया था। इस संशोधन में केंद्र से मामले की सुनवाई के लिए एक नया न्यायाधिकरण गठित करने का आग्रह किया गया था। यह संशोधन विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन (द्रमुक) के सुझाव के बाद शामिल किया गया था।

हालांकि, अन्नाद्रमुक और उसके सहयोगी पीएमके के अलावा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) ने भी इस संशोधन का विरोध किया था। भाकपा विजय सरकार को बाहर से समर्थन दे रही है। इन दलों का कहना था कि यह संशोधन विधानसभा सदस्यों को वितरित किए गए मूल प्रस्ताव का हिस्सा नहीं था।

सुनवाई के दौरान सरकार ने अदालत में कहा कि विधानसभा में प्रस्ताव याचिकाकर्ता और उनकी पार्टी की सहमति से सर्वसम्मति से पारित किया गया था। सरकार ने दलील दी कि सदन में प्रस्ताव का समर्थन करने के बाद कृष्णमूर्ति अदालत का रुख नहीं कर सकते।

अन्नाद्रमुक के सचेतक ने अपनी याचिका में मेकेदातु मुद्दे पर फैसला करने के लिए अलग न्यायाधिकरण के गठन का सुझाव देने वाले संशोधन को रद्द करने की मांग की थी।

कर्नाटक के मेकदातु बांध के विरोध वाला प्रस्ताव राज्य विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किया गया था। द्रमुक ने चर्चा में हिस्सा लेने और प्रस्ताव को अपना पूरा समर्थन देने का आश्वासन देने के बाद मतदान के दौरान सदन से बहिर्गमन किया था।

बहस के दौरान द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) नेता उदयनिधि स्टालिन ने एक नया न्यायाधिकरण गठित करने का सुझाव दिया था, जिसे मुख्यमंत्री ने प्रस्ताव में शामिल कर लिया और प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।

याचिका में अन्नाद्रमुक ने आरोप लगाया है कि यह संशोधन विधायकों को वितरित किए गए मूल प्रस्ताव का हिस्सा नहीं था और इसे उचित चर्चा के बिना पारित कर दिया गया। पार्टी ने दावा किया कि पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) और भाकपा एवं अन्य दलों की आपत्तियों के बावजूद बाद में इस प्रस्ताव को केंद्र सरकार को इस तरह भेजा गया, मानो इसे सर्वसम्मति से पारित किया गया हो।

गौरतलब है कि तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के नेतृत्व वाली नयी सरकार के पहले विधानसभा सत्र के दौरान राज्य विधानसभा ने कावेरी नदी पर मेकेदातु में नया बांध बनाने के कर्नाटक सरकार के प्रस्ताव का कड़ा विरोध करते हुए सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया था। इसके साथ ही, विवाद के समाधान के लिए अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत एक नया न्यायाधिकरण गठित करने का केंद्र सरकार से आग्रह किया गया था।

उस दिन 234 सदस्यीय विधानसभा में अध्यक्ष समेत कुल 233 सदस्य थे। इनमें से 145 विधायकों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। इनमें टीवीके के 107 विधायक और समर्थन देने वाले दलों के 13 सदस्य शामिल थे। इन 13 सदस्यों में कांग्रेस के पांच तथा वीसीके, आईयूएमएल, भाकपा और माकपा के दो-दो सदस्य थे। इसके अलावा अन्नाद्रमुक के 25 बागी विधायकों ने भी प्रस्ताव के समर्थन में मतदान किया था।

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