चेन्नई , जुलाई 27 -- मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरे पीठ ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को दी गयी सरकारी नौकरियों को सोमवार को रद्द कर दी।

सरकारी नौकरियां देने के विजय सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली 'नाम तमिलर काची' और अन्य की ओर से दायर जनहित याचिकाओं (पीआईएल) के एक समूह पर आदेश पारित करते हुए न्यायालय ने इस संबंध में जारी सरकारी आदेश को भी रद्द कर दिया।

न्यायमूर्ति सीवी कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर शक्तिवेल की पीठ ने कहा कि यह नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और 16 (सरकारी रोजगार में अवसर की समानता) का उल्लंघन है, क्योंकि हर सरकारी विभाग में अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरियों के लिए कई लोग कतार में इंतजार कर रहे हैं और उनकी जरूरतों को नजरअंदाज कर इस मामले में परिवारों को रोजगार देना उचित नहीं था।

न्यायालय ने यह भी ध्यान दिलाया कि पटाखा इकाइयों में विस्फोटों और सरकारी बसों से होने वाली दुर्घटनाओं में कई लोग मारे जा रहे हैं। अगर वे सभी परिवार अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी की मांग करने लगें तो सरकार क्या करेगी? इसके साथ ही न्यायालय ने राज्य का मुख्यमंत्री बनने के बाद श्री सी चंद्रशेखर विजय के 10 जुलाई को करूर के उनके पहले दौरे के दौरान 31 परिवारों के सदस्यों को सौंपे गये नियुक्ति पत्रों को रद्द कर दिया।

यह दौरा सितंबर 2025 में उनके राजनीतिक जनसंपर्क कार्यक्रम के दौरान हुई उस भगदड़ के बाद हुआ था, जिसमें 41 लोगों की जान चली गयी थी।

न्यायालय ने कहा, "यह न केवल रोजगार चाहने वाले हर व्यक्ति के लिए, बल्कि प्रतीक्षा सूची में खड़े उन लोगों के लिए भी अधिक प्रासंगिक है, जिन्होंने सेवा के दौरान अपने परिवार के सदस्य को खो दिया है। जब कोई प्रतीक्षा सूची मौजूद है, तो उनकी जरूरतों को नजरअंदाज करना और करूर घटना के पीड़ित परिवारों के सदस्यों को राहत प्रदान करना उचित नहीं है। हमारा मानना है कि ये नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत इस देश के नागरिक को दी गयी गारंटी का सीधा उल्लंघन हैं।"न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि यद्यपि राज्य ने संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत अपनी प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए आदेश पारित करने का दावा किया था, लेकिन ऐसी शक्तियों का प्रयोग संविधान की सीमाओं के भीतर ही किया जाना चाहिए।

न्यायालय ने कहा, "कार्यपालिका की शक्ति का प्रयोग संवैधानिक सीमाओं के भीतर होना चाहिए। यदि कार्यपालक कार्रवाई को निरंकुश छोड़ दिया जाए और पूरी छूट दे दी जाए तो अराजकता फैल जायेगी।"न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि वर्तमान मामले में अनुकंपा नियुक्ति की अनुमति दी जाती है तो यह अन्य तमाम लोगों के लिए भी ऐसा रोजगार मांगने के रास्ते खोल देगा। न्यायालय ने पटाखा इकाई दुर्घटनाओं और मोटर दुर्घटनाओं का उदाहरण दिया, जहां भले ही जान का नुकसान राज्य की निष्क्रियता के कारण हुआ हो, लेकिन पीड़ितों को अनुकंपा नियुक्तियां नहीं दी गयीं, बल्कि केवल अनुग्रह राशि दी गयी। न्यायालय ने कहा कि यदि ऐसी अनुकंपा नियुक्ति की अनुमति दी जाती है, तो राज्य को उपरोक्त मामलों में भी रोजगार देना पड़ेगा।

न्यायालय ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि रोजगार प्रदान करने के बजाय, राज्य ने योग्य परिवारों को तकनीकी कौशल प्रदान करने पर विचार क्यों नहीं किया, जिससे परिवारों में उद्यमी, नेता और आत्मनिर्भर व्यक्ति तैयार करने में मदद मिलती।

न्यायालय ने मामले के गुणों-दोषों में जाने से भी परहेज किया, क्योंकि सीबीआई जांच जारी है। इसकी निगरानी उच्चतम न्यायालय कर रहा है, जिसने मामला केंद्रीय एजेंसी को स्थानांतरित किया है और जांच की निगरानी के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश अजय रस्तोगी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय पैनल नियुक्त किया है।

गौरतलब है कि न्यायालय ने 10 जुलाई को तमिलनाडु सरकार के नीतिगत फैसलों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था और करूर भगदड़ पीड़ितों के परिवारों के 31 सदस्यों को नियुक्ति आदेश जारी करने की अनुमति दी थी। न्यायालय ने तब तमिलनाडु लोक सेवा आयोग (टीएनपीएससी) को मामले में पक्षकार बनाते हुए कहा था कि ये नियुक्तियां अस्थायी होंगी और न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेंगी।

न्यायालय ने यह आदेश तब पारित किया था, जब श्री विजय पीड़ित परिवारों से मिलने और अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति पत्र सौंपने के लिए अपने पहले करूर दौरे पर रास्ते में थे।

यह अंतरिम फैसला न्यायमूर्ति सीवी कार्तिकेयन और न्यायमूर्ति आर शक्तिवेल की पीठ ने मदुरै के एक अधिवक्ता धीरन तिरुमुरुगन की ओर से दायर याचिका पर सुनाया था, जिसमें पिछले वर्ष सितंबर में सार्वजनिक जनसंपर्क कार्यक्रम के दौरान हुई दुखद भगदड़ में जान गंवाने वाले 41 लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने के टीवीके सरकार के फैसले को चुनौती दी गयी थी।

पीठ ने तब माना था कि सरकार के नीतिगत फैसले में न्यायालय का हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा और मृतकों के परिवारों को नियुक्ति पत्र सौंपने के लिए सार्वजनिक कार्यक्रम की मंजूरी दी थी।

पीठ ने हालांकि कहा था कि नियुक्तियां अस्थायी होंगी और न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेंगी। न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई तय की थी, ताकि नियुक्त लोगों को पहला वेतन मिलने से पहले ही सुनवाई हो सके।

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