चेन्नई , सितंबर 16 -- मद्रास उच्च न्यायालय ने मदुरंतकम एवं धारापुरम विधानसभा सीटों पर छह अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों पर रोक लगाने से इनकार करते हुए चुनाव जीतने के कुछ ही समय बाद विधायकों के इस्तीफा देने और उसी सीट से दूसरी पार्टी के टिकट पर दोबारा चुनाव लड़ने को 'लोकतंत्र का मजाक' और मतदाताओं का अपमान करार दिया है।
न्यायालय ने चुनाव आयोग को ऐसी स्थितियों को रोकने के लिए दिशानिर्देश बनाने और उपचुनाव का खर्च इस्तीफा देने वाले उम्मीदवारों से वसूलने का निर्देश दिया है।
चेन्नई के अधिवक्ता के सुथन की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एसएम सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति के गोविंदराजन की पीठ ने बुधवार को कहा कि निर्वाचित विधायक का तुरंत इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी से दोबारा चुनाव मैदान में उतरना जनता के जनादेश का अनादर है।
पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दिशा-निर्देश तय करने चाहिए, ताकि इस तरह के इस्तीफों पर अंकुश लगाया जा सके और चुनाव का वित्तीय बोझ इस्तीफा देने वाले ऐसे विधायकों पर डाला जा सके।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एस जयकुमार, मरगथम कुमारवेल, पी सत्यभामा, इसाक्की सुबैया, सी विजयभास्कर और एमआर विजय भास्कर ने इस्तीफा देकर सत्तारूढ़ तमिझगा वेत्री कषगम (टीवीके) का दामन थाम लिया था।
आयोग ने इनमें से केवल मदुरंतकम और धारापुरम सीटों के लिए ही उपचुनाव की घोषणा की है, जबकि शेष पांच सीटों पर कानूनी याचिकाओं के लंबित होने के कारण चुनाव टाल दिये हैं।
अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि मरगथम कुमारवेल और पी सत्यभामा को टीवीके ने उन्हीं की खाली की हुई सीटों से फिर से उम्मीदवार बना दिया है। यदि इस प्रवृत्ति को बिना नियमों के छोड़ दिया गया तो भविष्य में बड़े पैमाने पर इस्तीफे होंगे, जिससे सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा।
इस पर न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम ने टिप्पणी की कि किसी विधायक को इस्तीफा देने से तो नहीं रोका जा सकता, लेकिन समस्या तब खड़ी होती है, जब वही व्यक्ति अपनी ही छोड़ी सीट पर दोबारा चुनाव लड़ता है। उन्होंने कहा कि संसद या चुनाव आयोग को इस असाधारण स्थिति का समाधान निकालना होगा।
महाधिवक्ता विजय नारायण के यह सूचित किए जाने पर कि मुख्य न्यायाधीश सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी की अध्यक्षता वाली पहली पीठ ने छह विधायकों के इस्तीफे की स्वीकृति से जुड़ी याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा है, न्यायालय ने मामले की सुनवाई शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी।
महाधिवक्ता ने दलील दी कि मौजूदा कानून पूर्व विधायकों को दोबारा चुनाव लड़ने से नहीं रोकता, इसलिए उपचुनाव रोकने की मांग वाली याचिका स्वीकार्य नहीं है। यह जनहित याचिका 12 सितंबर को दायर की गयी थी, जिसमें उपचुनाव पर रोक लगाने और दोनों टीवीके प्रत्याशियों के नामांकन को खारिज करने की मांग की गयी थी।
याचिकाकर्ता ने कहा कि राजनीतिक कारणों से जनप्रतिनिधियों के असामयिक इस्तीफों के कारण चुनाव आयोग और सरकार को अनावश्यक अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ता है।याचिका में मांग की गयी है कि चुनाव कराने का पूरा खर्च इस्तीफा देने वाले पूर्व विधायकों से वसूला जाये और ऐसे सदस्यों के एक निश्चित अवधि तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया जाये।
अन्नाद्रमुक के बागी विधायकों मरगथम कुमारवेल और सत्यभामा ने 13 मई को विधानसभा में टीवीके सरकार के पक्ष में मतदान किया था और बाद में अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद ये सीटें खाली घोषित की गयी थीं।
मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाले 'सेक्युलर एंड सोशल जस्टिस वेत्री अलायंस' (एसएसजेवीए) का गठन करने के बाद टीवीके ने इन दोनों बागी पूर्व विधायकों को नये गठबंधन के उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतारा है।
मुख्य विपक्षी दल द्रमुक और अन्नाद्रमुक ने भी अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। इसके अलावा नाम तमिलर काची (एनटीके) और वामपंथी दलों के मैदान में उतरने से इन सीटों पर पंचकोणीय मुकाबला होने के आसार हैं।
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