नयी दिल्ली , सितंबर 01 -- उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) से होने वाली मतगणना में 'टोटलाइजर' मशीनों के इस्तेमाल पर विचार करे।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने आयोग को केंद्र के समक्ष एक उपयुक्त प्रस्ताव रखने का निर्देश दिया।
यह निर्देश मतदाताओं की गोपनीयता बनाए रखने और बूथ-वार रुझानों को छिपाने के उद्देश्य से दिया गया है। चुनाव आयोग (ईसीआई) ने इस व्यवस्था का समर्थन करते हुए इसे लागू करने में आने वाली कानूनी और व्यावहारिक कठिनाइयों की ओर ध्यान आकर्षित किया।
केंद्र सरकार टोटलाइजर लागू करने में आने वाली संभावित बाधाओं (यदि कोई हो) और इसके किसी भी प्रतिकूल परिणाम का परीक्षण करेगी।टोटलाइजर मशीन परिणाम घोषित करने से पहले कई ईवीएम में दर्ज वोटों को आपस में मिला देती है। यह प्रत्येक पोलिंग बूथ का अलग परिणाम उजागर करने के बजाय कई बूथों के वोटों का कुल परिणाम दर्शाती है। इससे किसी खास इलाके या मोहल्ले के मतदान पैटर्न की पहचान करना मुश्किल हो जाता है, जिससे मतदाताओं को चुनाव बाद संभावित डराने-धमकाने या उत्पीड़न से सुरक्षा मिलती है।
आयोग की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू ने कहा कि आयोग मतदाताओं की पसंद को गुप्त रखने के पक्ष में है, लेकिन इसके लिए वैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होगी और बताया कि इससे 'फॉर्म 17सी' के माध्यम से सत्यापन की मौजूदा व्यवस्था प्रभावित होगी। मौजूदा व्यवस्था के तहत, उम्मीदवारों और उनके एजेंटों को व्यक्तिगत मतदान केंद्रों पर पड़े वोटों का विवरण दर्ज करने वाला 'फॉर्म 17सी' मिलता है, जिससे वे मतगणना के दौरान आंकड़ों का मिलान कर पाते हैं।
श्री नायडू ने कहा कि यदि टोटलाइजर के जरिए कई ईवीएम के वोटों को एक साथ मिला दिया गया तो इस तरह का बूथ-वार सत्यापन कठिन हो जायेगा।उन्होंने पीठ को यह भी सूचित किया कि यद्यपि आयोग ने पहले टोटलाइजर मशीनों की सिफारिश की थी, लेकिन इस प्रस्ताव को एक विशेषज्ञ समिति और राजनीतिक दलों के विरोध का सामना करना पड़ा था।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि आयोग की बतायी गयी कठिनाइयां टोटलाइजर व्यवस्था को पूरी तरह से खारिज करने के बजाय इसे लागू करने में आने वाली 'बाधाएं' प्रतीत होती हैं।
याचिकाकर्ता योगेश गुप्ता की ओर से पेश अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने टोटलाइजर के पक्ष में आयोग के पुराने रुख का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि बूथ-वार वोटिंग पैटर्न उजागर होने से मतदाता डराने-धमकाने और चुनाव बाद होने वाली हिंसा की चपेट में आ सकते हैं। उन्होंने बताया कि एक टोटलाइजर मशीन 14 ईवीएम के वोटों को एक साथ मिला सकती है।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने दलील दी कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 169 केंद्र सरकार को आयोग के परामर्श से मतगणना प्रक्रिया सहित चुनाव संचालन से जुड़े नियम बनाने का अधिकार देती है।
न्यायमूर्ति बागची ने चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 59ए का उल्लेख किया, जो मतदाताओं को उत्पीड़न से बचाने के लिए कुछ विशेष परिस्थितियों में कुल मतगणना की अनुमति देता है। उन्होंने सवाल किया कि यही सिद्धांत ईवीएम पर लागू क्यों नहीं किया जा सकता।
आयोग ने वीवीपीएटी आधारित सत्यापन के साथ टोटलाइजर व्यवस्था के तालमेल बिठाने में आने वाली संभावित कठिनाइयों की ओर भी ध्यान दिलाया।
इसके बाद पीठ ने केंद्र सरकार को नियम 59ए और विधि आयोग की 255वीं रिपोर्ट में टोटलाइजर पर की गयी सिफारिशों सहित इस प्रस्ताव का परीक्षण करने और यह तय करने का निर्देश दिया कि क्या ऐसी व्यवस्था लागू की जा सकती है।
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