चंडीगढ़ , अगस्त 26 -- भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) सेवानिवृत्त अधिकारी एवं पंजाब सरकार के पूर्व विशेष मुख्य सचिव केबीएस सिद्धू ने बुधवार को कहा है कि हाल में हुए मक्का समझौते को लेकर भारत की प्रतिक्रिया न तो अतिरंजित आशंका वाली होनी चाहिए और न ही उसे पूरी तरह खारिज करने वाली। उन्होंने कहा कि समझौते के वास्तविक प्रभावों का आकलन उसके प्रावधानों और व्यावहारिक क्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए।

श्री सिद्धू ने एक वर्चुअल सेमिनार में क्षेत्रीय सुरक्षा पर समझौते के प्रभावों पर चर्चा करते हुए कहा कि सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच सात अगस्त को अल-सफा पैलेस में हुआ त्रिपक्षीय समझौता पिछले कुछ सप्ताह से दो अतिवादी व्याख्याओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। एक पक्ष इसे महज फोटो-ऑप करार दे रहा है, जबकि दूसरा इसे भारत के खिलाफ उभरते 'इस्लामिक नाटो' के रूप में देख रहा है। उनके अनुसार दोनों आकलन समझौते के वास्तविक स्वरूप को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते।उन्होंने 'इस्लामिक नाटो' की संज्ञा पर कहा कि किसी गठबंधन की वास्तविक क्षमता केवल समझौते पर हस्ताक्षर से नहीं, बल्कि साझा कमान संरचना और सैन्य एकीकरण से तय होती है। उनके अनुसार मक्का समझौते में न तो कोई एकीकृत मुख्यालय है, न सर्वोच्च कमांडर, न स्थायी संयुक्त स्टाफ और न ही सामूहिक सैन्य प्रतिक्रिया लागू करने के लिए कोई स्पष्ट सार्वजनिक तंत्र है।

उन्होंने कहा कि तीनों देशों के बीच साझा भूमि सीमा नहीं है और न ही उनके बीच नाटो जैसे दीर्घकालिक संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण या अभ्यास का अनुभव है। उनके अनुसार यह समझौता मुख्य रूप से एक राजनीतिक प्रतिबद्धता है, जिसका अपने हस्ताक्षरकर्ता देशों के लिए कूटनीतिक महत्व है, लेकिन इसकी परिचालन क्षमता फिलहाल सीमित है।

भारत की सुरक्षा तैयारियों पर चर्चा करते हुए उन्होंने सऊदी अरब की वित्तीय क्षमता, तुर्की के ड्रोन, बंगलादेश में कट्टरपंथ और चीन के सैन्य सहयोग को चार महत्वपूर्ण कारकों के रूप में रेखांकित किया। हालांकि उन्होंने कहा कि इनमें से प्रत्येक का अपना महत्व है, लेकिन अकेले कोई भी कारक भारत के लिए निर्णायक चुनौती नहीं बनता। उन्होंने मई 2025 में पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचे के खिलाफ भारत द्वारा चलाए गए 'ऑपरेशन सिंदूर' का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत की बहुस्तरीय वायु रक्षा प्रणाली ने पहले ही एक ऐसे खतरे के कम विविधतापूर्ण स्वरूप का सामना किया है। उन्होंने भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान द्वारा शुरुआती परिचालन कमियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किए जाने को कमजोरी के बजाय संस्थागत ईमानदारी का संकेत बताया।

श्री सिद्धू ने हालांकि भारतीय सुरक्षा व्यवस्था में दो क्षेत्रों पर लगातार ध्यान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि भारत के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान एएमसीए के 2030 के दशक के मध्य तक परिचालन में आने से पहले एक क्षमता अंतर बना रह सकता है, जबकि चीन से पाकिस्तान को जे-35 लड़ाकू विमानों की आपूर्ति शुरू होने की संभावना है। इसके अलावा उन्होंने बंगलादेश में बिगड़ते सुरक्षा माहौल को भारत के लिए एक अतिरिक्त सुरक्षा चुनौती बताया।

चीन के साथ भारत के संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बीजिंग के साथ कूटनीतिक संवाद और अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करना एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की प्रस्तावित भारत यात्रा की मेजबानी करने के साथ-साथ भारत द्वारा अपनी वायु रक्षा क्षमता में निवेश जारी रखना व्यावहारिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

सेमिनार में समझौते के इजराइल पर संभावित प्रभावों तथा अमेरिका द्वारा खाड़ी देशों, तुर्की, इजराइल और भारत के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाने की रणनीति पर भी चर्चा हुई।

श्री सिद्धू, जो 'द केबीएस क्रॉनिकल' के संस्थापक-संपादक हैं, ने कहा कि मक्का समझौते के दीर्घकालिक प्रभावों का आकलन करते समय राजनीतिक प्रतीकात्मकता और वास्तविक सैन्य क्षमता के बीच अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भारत को न तो अनावश्यक भय पैदा करने की जरूरत है और न ही संभावित चुनौतियों को नजरअंदाज करना चाहिए।

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