अमृतसर , अगस्त 22 -- पंजाब की पूर्व मंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की वरिष्ठ नेता प्रो. लक्ष्मीकांता चावला ने रेलवे में विभिन्न अपराधों के लिए निर्धारित जुर्माने की राशि पर सवाल उठाते हुए रेल मंत्रालय से इस व्यवस्था की समीक्षा करने की मांग की है।
प्रो. चावला ने शनिवार को कहा कि रेलवे में अपराध करने वालों पर जुर्माना लगाकर उन्हें अदालतोंमें पेश होने और मुकदमे की प्रक्रिया से बचाने का फैसला पहली नजर में उचित लगता है, लेकिन अलग-अलग अपराधों के लिए तय आर्थिक दंड की राशि को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा कि रेलवे स्टेशन परिसर या ट्रेन में भीख मांगने अथवा बिना अनुमति सामान बेचने वाले व्यक्ति पर 2,000 रुपये का जुर्माना निर्धारित किया गया है, जबकि शराब पीकर रेलवे परिसर या ट्रेन में हुड़दंग करने वाले व्यक्ति पर केवल 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। उन्होंने सवाल किया कि यात्रियों की सुरक्षा और शांति भंग करने वाला नशे में उपद्रव अधिक गंभीर है या मजबूरी में भीख मांगना?प्रो. चावला ने कहा कि जो व्यक्ति भीख मांगकर अपना गुजारा करता है, वह 2,000 रुपये का जुर्माना आखिर कहां से भरेगा। उन्होंने आशंका जताई कि जुर्माना न भर पाने की स्थिति में ऐसे गरीब लोगों के लिए जेल जाने का रास्ता आसान हो सकता है।
उन्होंने कहा कि रेलवे स्टेशन या ट्रेन में भीख मांगने वालों को वहां से हटाना एक अलग बात है, लेकिन उनकी गरीबी के कारण उन पर भारी आर्थिक दंड लगाना मानवीय दृष्टि से उचित नहीं लगता। उन्होंने यह भी कहा कि रेलवे परिसर में बिना प्लेटफार्म टिकट प्रवेश करने वाले व्यक्ति पर 500 रुपये का जुर्माना है, जबकि भिखारी के लिए 2,000 रुपये का दंड तय किया गया है। यह अंतर पुनर्विचार की मांग करता है।
प्रो. चावला ने रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव से आग्रह किया कि रेलवे के इस निर्णय की समीक्षा की जाये और जुर्माने की राशि तय करते समय अपराध की गंभीरता के साथ-साथ संबंधित व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखा जाये। उन्होंने कहा कि शराब या अन्य नशे में यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार करने, उपद्रव मचाने अथवा रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करने वालों पर अधिक कठोर जुर्माना लगाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसे नियम बनाने चाहिए जो कानून-व्यवस्था बनाये रखने के साथ गरीब और जरूरतमंद लोगों के प्रति मानवीय संवेदनशीलता भी सुनिश्चित करें। रेलवे स्टेशन से भिखारियों को हटाना और उनकी गरीबी को आर्थिक दंड से दंडित करना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए रेलवे मंत्रालय को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए।
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