चेन्नई , जुलाई 16 -- भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी के नये दौर की शुरुआत करते हुए देश के पहले निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल श्रेणी के रॉकेट 'विक्रम-1' का पहला परीक्षण प्रक्षेपण 'मिशन आगमन' के तहत 18 जुलाई को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया जाएगा।

इसरो सूत्रों ने गुरुवार को बताया कि हैदराबाद की निजी अंतरिक्ष कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित इस रॉकेट का प्रक्षेपण प्रथम प्रक्षेपण परिसर से सुबह 11:30 बजे किया जाएगा। रॉकेट 60 डिग्री के झुकाव के साथ 450 किलोमीटर ऊंची निम्न पृथ्वी कक्षा (एलईओ) में स्थापित किया जाएगा।

स्काईरूट ने सोशल मीडिया पर कहा कि भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट प्रक्षेपण के लिए पूरी तरह तैयार है और यह मिशन भारत के निजी अंतरिक्ष कार्यक्रम के नये अध्याय की शुरुआत करेगा।

रॉकेट में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के कई प्रौद्योगिकी प्रदर्शन (टेक्नोलॉजी डेमॉन्स्ट्रेशन) पेलोड भेजे जाएंगे। इनमें तेलंगाना के कलाकार अजय कुमार मट्टेवाड़ा द्वारा तैयार 18 कैरेट स्वर्ण रॉकेट भी शामिल है, जिसमें नोबेल पुरस्कार विजेता सर सी. वी. रमन, भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई और पूर्व राष्ट्रपति एवं प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की सूक्ष्म प्रतिमाएं अंकित हैं। इन प्रतिमाओं का आकार चावल के दाने से भी छोटा है।

मिशन के अन्य प्रमुख पेलोड में कर्नाटक की कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा विकसित 16.95 कैरेट का 'कॉस्मिक ब्लूम' डायमंड लोटस, स्काईरूट का स्कोप उपग्रह, कर्नाटक की ग्रहा स्पेस का सोलारास एस-3 क्यूबसैट, तेलंगाना की कॉसमोसर्व स्पेस का कक्षीय रोबोटिक भुजा प्रदर्शन 'एम्ब्रेस', तथा जर्मनी की डीक्यूब्ड के कक्षीय प्रौद्योगिकी प्रदर्शन पेलोड शामिल हैं।

विक्रम-1 सात मंजिला इमारत जितना ऊंचा बहु-चरणीय प्रक्षेपण यान है। इसमें कार्बन कंपोजिट संरचना, ठोस ईंधन बूस्टर और थ्री-डी प्रिंटेड तरल इंजन का उपयोग किया गया है। इसे 350 किलोग्राम तक के छोटे उपग्रहों को 450 किलोमीटर ऊंची निम्न पृथ्वी कक्षा तथा 260 किलोग्राम तक के उपग्रहों को सूर्य समकालिक कक्षा में स्थापित करने के लिए विकसित किया गया है।

स्काईरूट के अनुसार, मिशन आगमन का मुख्य उद्देश्य रॉकेट के प्रणोदन, चरण पृथक्करण, मार्गदर्शन, नेविगेशन, नियंत्रण प्रणाली तथा समग्र उड़ान प्रदर्शन से संबंधित महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाना है। इन आंकड़ों के आधार पर रॉकेट के डिजाइन का सत्यापन किया जाएगा और भविष्य में नियमित वाणिज्यिक प्रक्षेपण सेवाओं का मार्ग प्रशस्त होगा।

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